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थैलीसीमिया से पीड़ित है बेटी, पर हारी नहीं मां

6 वर्ष पहले
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श्रीगंगानगर। अचानक किसी अपने को खोने की पीड़ा कम नहीं होती, लेकिन किसी अपने का पल पल मौत के नजदीक होते जाना, इसका अहसास कस्बे में रह रही गीता उसके पति धन्नाराम से ज्यादा और कोई महसूस नहीं कर सकता।
गीता धन्नाराम की दस वर्षीय पुत्री पूजा थैलीसीमिया रोग से पीड़ित है जो लाइलाज है। कस्बे में रह रही गीता अलसुबह कचरा बीनने दिन में थड़े पर मनिहारी की दुकान चलाती है पति धन्नाराम मोची है जो जूते बनाने का काम कर घर का खर्चा चला रहे हैं। गीता का कहना है कि दस वर्ष पहले पहली संतान में रूप में उनके घर पुत्री का आगमन हुआ।
दो माह बाद बेटी बीमार हो गई ओर दिनों दिन कमजोर होती गई। सूरतगढ़ में डॉक्टर को दिखाया तो ब्लड चढ़ाने पर स्वस्थ हो गई। कुछ माह बाद जोधपुर लैब में जांच करवाई तो बताया गया कि बच्ची को थैलीसीमिया है, इसे जीवन भर ब्लड चढ़ाना पड़ेगा। दस वर्ष से पुत्री पूजा को माह में एक बार श्रीगंगानगर के तपोवन प्रन्यास में ब्लड चढ़ाया जा रहा है।

गीता ने बताया कि उसे गरीबी और पुत्री की बीमारी दोनों से हर रोज जंग लड़नी पड़ रही है। गीता सुबह पांच बजे कचरा बीनने निकलती है और सात बजे वापस आकर चाय नाश्ता बनाकर सात बजे फुटपाथ पर मनिहारी का सामान बेचती है।
गीता ने बताया कि पुत्री के इलाज में जोधपुर दिल्ली में हुई जांचों में उसके लाखों रुपए खर्च हो गए। उसने बताया कि उसके दो पुत्रियां मनीषा बाईसा ओर हुई, भगवान का शुक्र हैं वे स्वस्थ हैं। एक पुत्री के इलाज दो पुत्रियों के पालन पोषण में खर्च संभालने के पति प|ी दोनों मजदूरी कर रहे हैं।

^देश में प्रतिवर्ष आठ से दस हजार बच्चे थैलीसिमिया से ग्रस्त जन्म लेते हैं। थैलीसीमिया रोग में हिमोग्लोबिन पूरा नहीं बनता। खून की कमी से पीलापन, शरीर का विकास रुक जाना जिगर की तिल्ली तथा ह्रदय का आकार बढ़ जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। बोन मैरू ट्रांस प्लांटेशन से इलाज संभव है लेकिन यह खर्चीला और खतरे से भरा है। डॉ.मायाशंकर, तपोवन प्रन्यास, श्रीगंगानगर।