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आदमी ‘आम’, हर रोज चूसा और फेंका जा रहा है...

7 वर्ष पहले
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अखिल भारतीय साहित्य परिषद की कवि गोष्ठी

नगरसंवाददाता|श्रीगंगानगर.

\\\"मेरेसरपर वो बुजुर्गों की हवा लगती है, मेरी बेटी मुझे जन्नत की हवा लगती है\\\', \\\"देश का आम आदमी आम बन गया है जो हर रोज चूसा और फेंका जा रहा है...\\\'जैसी कविताओं और गजलों के साथ शनिवार रात यहां देशभर से आए कवियों ने अपनी रचनाओं से वाहवाही लूटी। मौका था अंधविद्यालय परिसर स्थित सुंदरम पैलेस में कवि गोष्ठी का। इसमें उन्होंने भ्रष्टाचार जैसी कुरीतियों पर प्रहार किया और बेटियों के प्रति अपना प्यार भी जाहिर किया। अध्यक्षता वरिष्ठ कवि मोहन आलोक ने की।

कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. शिवराज भारती ने राजस्थानी भाषा में सरस्वती वंदना गाकर की। इसके बाद कवियों ने अपनी रचनाओं से समां बांध दिया। रुड़की से आए कवि रामवीर सिंह राहगीर ने \\\"बेटियां रब की दुआ हैं, जमीं पर ठंडी हवा हैं\\\' कविता के माध्यम से एक पिता और उसकी पुत्री के स्नेह को बताया। सत्यपाल लोहिया ने अपनी रचना \\\"मत पूछ क्या नसीब है इश्क का.. कि दिए की हिफाजत सौंपी है हवाओं को\\\' के माध्यम से वाह वाही लूटी। झांसी से आए कवि संजीव दुबे ने अपनी रचना के माध्यम से बॉर्डर पर तैनात जवानों की स्थिति का वर्णन किया। डॉ. जितेंद्र वशिष्ठ, कृष्ण कुमार आशु, डाॅ. संदेश त्यागी अरुण शहरिया सहित अन्य कई कवियों ने भी अपनी रचनाएं सुनाकर सबकी सराहना पाई।

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