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कमीनपुरा का नाम प्रतापगढ़ करने के पक्ष में 100 फीसदी वोट, नाम रख दिया महादेवनगर
भास्कर संवाददाता|श्रीगंगानगर
कमीनपुराकानाम प्रतापगढ़ के बजाय महादेवनगर करने से यहां के निवासियों में गुस्सा फैल गया है। लोगों में ज्यादा गुस्सा इस बात को लेकर है कि प्रशासन ने 18 जनवरी को गांव में जनमत कराया। 100 फीसदी वोट प्रतापगढ़ के पक्ष में पड़े। एक भी वोट महादेवनगर के पक्ष में नहीं गया। फिर भी सरकार ने मनमर्जी करते हुए कमीनपुरा का नाम बदलकर महादेवनगर कर दिया। सरकार के इस फैसले के खिलाफ गांव के लोग अब कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।
कमीनपुरा गांव के लोग यूं तो नाम बदलने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे। लेकिन प्रशासन तब जागा, जब यहां शुगर मिल बनकर तैयार हुई और सीएम ने यहां उद्घाटन के लिए आने की सहमति दी। प्रशासन ने गांव के लोगों से बात की तो कुछ प्रतापगढ़ के नाम पर सहमत थे तो कुछ महादेवनगर के नाम पर। महादेवनगर के नाम पर लोगों में बड़ी आपत्ति यह थी कि महादेव गुप्ता इसी इलाके के समाजवादी नेता थे। ऐसे में एक व्यक्ति के नाम पर गांव का नाम कैसे हो सकता है? इस पर प्रशासन ने 18 जनवरी को जनमत कराने का निर्णय लिया। प्रशासन ने एसीईओ रचना भाटिया को चुनाव अधिकारी बनाकर गांव भेजा। सुबह से शाम तक गांव में वोटिंग हुई। लोगों को दो विकल्प दिए गए। पहला महादेवनगर और दूसरा प्रतापगढ़। गांव में कुल 1935 वोट हैं। जनमत के दिन 297 वोट पड़े और सभी वोट प्रतापगढ़ के पक्ष में ही पड़े। लोग तो मानकर बैठे थे कि गांव का नाम प्रतापगढ़ ही होगा, लेकिन सरकार ने एकाएक नाम बदलकर महादेवनगर कर दिया। यह लोगोंे के गले नहीं उतर रहा।
कलेक्टर ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि नाम तय करना सरकार का काम है। लोगों ने सवाल किया कि जब सरकार ने अपनी मर्जी चलानी थी तो जनमत क्यों कराया? ग्रामीण सरदूलसिंह ने बताया कि कलेक्टर पहले महादेवनगर नाम के खिलाफ थे। बुधवार को वो महादेवनगर से खुश थे। कलेक्टर ने कहा कि प्रतापगढ़ अच्छा नाम नहीं है। महादेव शिव का नाम है। इस नाम से भगवान खुश होंगे। उन्होंने यह भी कह डाला कि गांव में शिव का बड़ा मंदिर बनाया जाए। वहां देवी-देवताओं की मूर्तियां वो स्थापित करवा देंगे।
इनसाइड स्टोरी: बहाना था वोटिंग, सरकार चाहती थी कि नाम महादेवनगर हो
भास्करने पड़ताल की कि आखिर वोटिंग में प्रतापगढ़ को बहुमत के बावजूद नाम महादेवनगर क्यों किया गया? खुलासा हुआ कि यह सरकार की सोची-समझी रणनीति थी। सरकार खुद ही चाहती थी कि इस गांव का नाम महादेवनगर ही किया जाए। दरअसल, गांव का नाम बदलने का नियम है कि पहले ग्राम सभा से प्रस्ताव लिया जाएगा। इसके बाद प्रशासन रिपोर्ट भेजेगा। फिर अंतिम निर्णय उस पर सरकार ले सकती है। इस प्रक्रिया का पालन नहीं होने पर ग्रामीण कोर्ट जाकर स्टे ला सकते हैं। इसी से बचने के लिए सरकार ने यहां वोटिंग करवाकर ग्राम सभा से प्रस्ताव लिया। प्रशासन ने भी सरकार की मंशा के अनुसार रिपोर्ट भेजी। फिर आखिरकार सरकार ने अपनी इच्छा के मुताबिक गांव का नाम महादेवनगर कर दिया।