श्रीगंगानगर। अगले सप्ताह से शुरू हो रही दुर्गा पूजा की तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं। माता की भव्य मूर्तियां तैयार करने के लिए पश्चिम बंगाल और बिहार से आए मूर्तिकार तीन महीनों से तैयारी में जुटे थे। खास बात यह है कि शहर में जो मूर्तियां तैयार होती हैं उनकी मिट्टी कलकत्ता और बिहार से मंगाई जाती है। इससे मूर्तियों का महत्व और भी बढ़ जाता है।
दो तरह की मिट्टी से बनती हैं मूर्तियां : बिहार के कारीगर सीताराम ने बताया कि मूर्तियों को तैयार करने के लिए दो तरह की मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। एक काली और दूसरी गोरा मिट्टी। काली मिट्टी महंगी हाेेती है और यह पश्चिम बंगाल के रेड लाइट एरिए से लाई जाती है। दूसरी गोरा मिट्टी, यह बिहार से आती है। इन दोनों ही जगहों से मिट्टी को बोरों में भरकर ट्रेन से लाया जाता है। पहले काली मिट्टी से मूर्तियों के हाथ, पैर, मुंह और शरीर का ढांचा तैयार किया जाता है। जब यह सूख जाती है तो फिर गोरा मिट्टी से दोबारा इसके ऊपर परत चढ़ाई जाती है। इससे मूर्ति चटकती नहीं है और उसमें चमक आती है। मान्यता है कि पश्चिम बंगाल बिहार की मिट्टी से मूर्ति तैयार करने से मूर्तियों की महिमा और बढ़ जाती है।
18 वर्षों से सिर्फ मूर्तियां तैयार करने आते हैं यहां :मूर्तिकार सीताराम ने बताया कि वह 18 वर्षों से यहां आकर मूर्तियां बना रहा है। हर साल वह बिहार से शहर केवल मूर्तियां बनाने ही आता है। इसका एक साथी सुभाष है जाे पश्चिम बंगाल का निवासी है। ये लोग श्रीगंगानगर शहर, केसरीसिंहपुर, श्रीकरणपुर और जिले में कई जगहों में जाकर मूर्तियां बनाते हैं। इसके लिए तीन-चार महीने पहले तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। सीताराम के मुताबिक वे जून-जुलाई में ही शहर जाते हैं और मूर्तियां बनाने का काम शुरू कर देते हैं। दीवाली के बाद यहां से वापस जाते हैं।
दुर्गा पूजा की तैयारियों में तीन महीने पहले से जुट जाते हैं कारीगर
यह मूर्तियां भी होती हैं तैयार : दुर्गा मां की मूर्ति के अलावा उनकी सवारी शेर, महिषासुर, शिव-पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय और नंदी की भी मूर्तियां कारीगर तैयार करते हैं।
(श्रीगंगानगर. दुर्गा पूजा के लिए मूर्तियों को तैयार करता मूर्तिकार।)