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आजकल कविताएं भी बंध कर रह गई हैं : श्रीधर
नगर संवाददाता|श्रीगंगानगर.
कवितावही सुंदर होती है, जो पूर्णता स्वतंत्र भाव से लिखी जाती है। मगर आजकल कवि की कविताएं भी समाज के बंधनों में बंधकर रह गई है। धर्म, संस्कृति और समाज पर अगर कोई साहित्यकार लिखता है तो लाेग उसे सांप्रदायिक कह देते हैं। यह बात अंधविद्यालय के सुंदरम पैलेस में अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान की श्रीगंगानगर इकाई की ओर से आयोजित राष्ट्रीय गोष्ठी के दौरान मुख्य वक्ता श्रीधर पराडकर ने कही। मुख्य अतिथि के रूप में महर्षि पाणिनी संस्कृत विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति डॉ. म
आजकल कविताएं भी बंध कर रह गई हैं : श्रीधर
आज भी ढूंढ़ रहा हूं अपनी पहली रचना
वरिष्ठकवि मोहन आलोक ने बताया कि उन्होंने 16 वर्ष की उम्र से लिखना शुरू कर दिया था। मगर उन्होंने यह नहीं सोचा था कि उनकी लिखी रचनाएं एक दिन प्रकाशित होंगी और लोग उन्हें इतना पसंद करेंगे। उनकी पहली रचना चेतना और चिंगारी थी जो वर्ष 1958 में प्रकाशित हुई थी, जिसकी एक भी प्रति उनके पास नहीं है। उनका कहना था कि आज भी वह इसे ढूंढ़ रहे हैं और अपने हर जानकार से वह इसके बारे में पूछते रहते हैं। बताया कि उन्हें बचपन से ही हरिवंश राय बच्चन की रचनाएं बहुत पसंद थी। इससे प्रेरित होकर उन्होंने लिखना भी शुरू किया। साहित्य जगत का पहला पुरस्कार उन्हें वर्ष 1981 में मिला था।
पितागुरु से मिली प्रेरणा
कविओम पुरोहित \\\"कागद\\\' का कहना है कि साहित्य की प्रेरणा उन्हें अपने पिता रिद्धकरण पुरोहित से मिली। पिता साहित्यकार होने के कारण शुरू से ही उन्हें अपने घर पर कविताओं और साहित्य भरा माहौल मिला। उनकी पहली रचना वर्ष 1970 में प्रकाश में आई जब वह महज 14 वर्ष के थे। इतनी कम उम्र में रचना करने के बाद उन्हें स्कूल और घर हर जगह प्रोत्साहन मिलने लगा, जिससे उनकी लिखने की क्षमता का विकास होता चला गया। इसके बाद उन्होंने अंतस री बळत, कुचरणी जैसी राजस्थानी और हिंदी भाषा में कई रचनाएं लिखकर कई प्रसिद्ध पुस्तकों का प्रकाशन किया।
श्रीगंगानगर. राष्ट्रीय गोष्ठी में मंचासीन अतिथि।
ओम पुरोहित
मोहन आलोक