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आज कल कविताएं भी बंध कर रह गई हैं : श्रीधर
नगर संवाददाता| श्रीगंगानगर.
कवितावही सुंदर होती है, जो पूर्णता स्वतंत्र भाव से लिखी जाती है। मगर आजकल कवि की कविताएं भी समाज के बंधनों में बंधकर रह गई हैं।
धर्म, संस्कृति और समाज पर अगर कोई साहित्यकार लिखता है तो लाेग उसे सांप्रदायिक कह देते हैं। यह बात अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान की श्रीगंगानगर इकाई की ओर से अंधविद्यालय के सुंदरम पैलेस में आयोजित राष्ट्रीय गोष्ठी में मुख्य वक्ता श्रीधर पराडकर ने कही। मुख्य अतिथि के रूप में महर्षि पाणिनी संस्कृत विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति डॉ. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी तथा स्वामी ब्रह्मदेव मौजूद थे।
वक्ताओं ने \\\"भारतीय साहित्य और कुटुंब\\\' विषय पर विचार रखे। मुख्य अतिथि डॉ. त्रिपाठी ने संबोधन में कहा कि हमारे देश में बड़े-बड़े साहित्यकार हैं, जो सारी दुनिया के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। साहित्य से जुड़ाव रखने वाले कभी दूसरों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचा सकते, क्योंकि साहित्य सद्भाव सिखाता है। मुख्य वक्ता ने अखिल भारतीय साहित्य परिषद का परिचय दिया और बताया कि सिर्फ धन कमाने और विलासिता भरी सुविधाएं एकत्र कर लेने मात्र से ही हमारा जीवन पूर्ण नहीं हो सकता है।
श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले के 4 साहित्यकारों को शॉल ओढ़ाकर और श्रीफल देकर सम्मान किया गया।
इस दौरान कार्यक्रम संयोजक डॉ. अन्नाराम शर्मा ने \\\"भारतीय साहित्य और कुटुंब\\\' नामक पुस्तक का विमोचन भी किया। देश भर से 100 से ज्यादा साहित्यकारों ने इस गोष्ठी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
इनकाहुआ सम्मान
वरिष्ठकवि मोहन आलोक श्रीगंगानगर, जनकराज पारीक श्रीकरणपुर, डॉ. मंगत बादल रायसिंहनगर और आेम पुरोहित \\\"कागद\\\' हनुमानगढ़।