चारणवासी. समाज सेवा के लिए समय निकालना मुश्किल है लेकिन गांव जसाना का 80 वर्षीय बुजुर्ग श्योकरण सिहाग इसका अपवाद है। माथे पर बुढ़ापे की झुरियां, हाथ में लकड़ी का सहारा ओर कांपता शरीर।
इसके बावजूद श्योकरण सिहाग सुबह से लेकर देर रात तक अपने घर में बनी नंदी गोशाला में गायों के बीच उनका लालन-पालन करते हैं। सुनने में भले ही अटपटा लगे लेकिन ये सत्य है कि गोवंश की दुर्दशा से दुखी श्योकरण सिहाग ने अपने घर में ही नंदी गोशाला बना दी। इसमें वे बेसहारा बछड़ों की सेवा करते हैं।
ऐसे उठाया बीड़ा
बुजुर्ग श्योकरण ने बताया कि छह माह पूर्व एक बछड़ा उनकी आंखों के सामने जख्मी हो गया। ग्रामीणों के सहयोग से घायल बछड़े को गांव कि गोशाला में लेकर गए तो जगह की कमी बता कर लेने से मना कर दिया। श्योकरण ने बताया कि बेजुबान बछड़े की हालत ने उन्हें गो सेवा के लिए मजबूर कर दिया। उसी दिन श्योकरण ने बाकी बची जिंदगी गोसेवा को समर्पित कर गोवंश बचाने का बीड़ा उठा लिया।
घायल बछड़े को उन्होंने अपने बाड़े में मंगवाया लिया और संतान की तरह उसका उपचार करवाया। घायल बछड़ा आज पूर्ण रूप से स्वस्थ है। इसके देखकर गांव के पूर्णाराम स्याग, रोहताश बेनीवाल, सुल्तान जोशी, हनुमान स्याग आदि ने भी सहयोग किया और श्योकरण की निजी गोशाला का नाम नंदीशाला रख दिया। अब गांव में कहीं भी नजर आने वाले निराश्रित घायल गाय, बछड़े को नंदी गोशाला में लाया जाता है। वर्तमान में नंदी गोशाला में लगभग तीन दर्जन गाय बछड़े हैं।
खुद जुटाते हैं गोवंश पर होने वाला खर्च
बुजुर्ग श्योकरण सिहाग ने बताया कि गायों के लिए उनके घर से ही तूड़ी चारा आत है। पशुओं को पानी पिलाने के लिए एक छोटी सी खेळ बना रखी है, जिसमें बालटियों से पानी भर कर एक-एक कर सभी गाय बछड़ों की प्यास बुझाते हैं। पशुओ के बीमार होने पर अपने पास से राशि खर्च से निजी चिकित्सक से पशुओं का इलाज भी करवाते हैं। बुजुर्ग श्योकरण सिहाग ने युवाओं से भी गोसेवा की अपील की है।