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देवस्थान सचिव, हाईकोर्ट के आदेश बेअसर 15 साल में भी नहीं बनी मैनेजमेंट कमेटी
बापूबाजार स्थित सट्टेवालों की धर्मशाला में मैनेजमेंट कमेटी के गठन के लिए देवस्थान निदेशालय के सचिव के 15 साल में दिए गए चार और हाईकोर्ट के पांच साल में दिए गए दो आदेशों का तो पालन हुआ, ही रिसीवर नियुक्त नहीं किया गया। स्थानीय विभागीय अधिकारियों के बेपरवाह होने के नतीजतन मुख्य ट्रस्टियों की वल्दियत बदलकर ट्रस्टी बने कुछ वारिसों ने धर्मशाला की दो दुकानों की जमीन ही बेच दी।
ज्ञात रहे कि देवस्थान सचिव ने इस धर्मशाला के मामले में प्रन्यास संपदा के रखरखाव में गबन और गड़बड़ी होने पर मैनेजमेंट कमेटी बनाने के आदेश दिए थे। तिमंजिला धर्मशाला 1949 में बनी थी। करीब 850 वर्गगज में 32 कमरे, 18 हॉल और 10 दुकानें हैं। इसकी वर्तमान कीमत 100 करोड़ रु. से अधिक है। शुरुआत में 21 ट्रस्टी थे। साल 2002 तक 15 ट्रस्टियों की मृत्यु हो चुकी है। इनमें से अधिकांश के स्थान पर कुछ वल्दियत बदलकर उनका वारिस बताकर अपना दावा करने लगे, तो मुख्य ट्रस्टी कपूरचंद जैन के वारिस कन्हैयालाल और धीरज बबर ने देवस्थान विभाग में अपील की। देवस्थान सचिव ने सुझाव मांगने के बाद जून 2001, जुलाई 2002, जनवरी 2007 2008 में आदेश दिया, लेकिन मैनेजमेंट कमेटी नहीं बनने पर ट्रस्टियों ने हाईकोर्ट में अपील की। कोर्ट ने 2011 और फिर अप्रैल 2015 में आदेश दिए थे, लेकिन स्थानीय देवस्थान विभाग ने तो कमेटी बनाई, ही रिसीवर नियुक्त किया।
ट्रस्टी कन्हैयालाल का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद पिछले करीब दस माह से विभागीय अधिकारी तारीख पर तारीख ही दे रहे हैं। इस बीच, वल्दियत बदलकर मुख्य ट्रस्टियों के वारिस बने कुछ ट्रस्टियों ने धर्मशाला की दो दुकानों की जमीन बेच दी। इस बारे में जब विभागीय अधिकारी से शिकायत की, तो उन्होंने ये कहकर पला झाड़ लिया कि अपने आप रजिस्ट्री कैंसिल कराएं, हमारा कोई लेना-देना नहीं है।
देवस्थान में रजिस्टर्ड किसी प्रन्यास के ट्रस्टियों के खिलाफ अव्यवस्था और गड़बड़ी की शिकायत आती है तो विभाग सार्वजनिक प्रन्यास अधिनियम 1959 के तहत मैनेजमेंट कमेटी गठन का प्रावधान है, नहीं तो रिसीवर नियुक्त कर विभाग ट्रस्ट का मैनेजमेंट संभालता है।
ऐसे अस्तित्व में आई थी धर्मशाला
सट्टेवालोंकी धर्मशाला 1949 से पहले चाकसू ठाकुर साहब की हवेली थी। चाकसू ठाकुर दूल्हा ठाकुर साहब के रिश्तेदार थे। उस समय 21 जनों ने मिलकर ठाकुर साहब से ये जमीन खरीदी थी। उन दिनों सट्टा खेलना वैध माना जाता था। इस वजह से इसका नाम सट्टेवालों की धर्मशाला हो गया। इसकी धर्मादा राशि में से 2 प्रतिशत व्यापारियों से ली गई। तब इसकी कीमत 35,990 रु. लगाई गई थी। एक किश्त में आधी राशि देकर बाकी राशि माफ करवा ली गई थी। फिर 1982 में धर्मशाला को बेचने पर झगड़ा हुआ। तब के एक ट्रस्टी कन्हैयालाल खंडेलवाल (अब दिवंगत) ने देवस्थान विभाग में ट्रस्ट रजिस्टर्ड करा लिया। वर्ष 2002 तक करीब 15 ट्रस्टियों के निधन के बाद कुछ लोगों ने उनका वारिस बताकर ट्रस्टी बनने का दावा किया। तब मामला देवस्थान और फिर वहां से हाईकोर्ट में चला गया।
जल्द ही कमेटी गठित करेंगे
^सट्टेवालोंकी धर्मशाला में मैनेजमेंट कमेटी के गठन की सुनवाई चल रही है। उसको जल्दी पूरी करके कमेटी गठित करेंगे। -राजीवपांडे, सहायक आयुक्त, देवस्थान विभाग, जयपुर