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पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट के बाद डायबिटीज से छुटकारा संभव, लेकिन डोनर बहुत कम

5 वर्ष पहले
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पाचकग्रंथि अगन्याशय (पैंक्रियाज) के प्रत्यारोपण के बाद कोई भी व्यक्ति डायबिटीज से मुक्त हो सकता है, लेकिन इसके डोनर काफी कम होने और काफी महंगा होने से बहुत कम लोग यह करा पाते हैं। डायबिटीज के कॉम्पलीकेशन से ही किडनी खराब होती है और पैंक्रियाज भी। यह कहना है डॉ. रॉन सेप्रियो का, जो न्यूयॉर्क के माउंटेन सिनॉय हॉस्पिटल के किडनी और पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट स्पेशलिस्ट हैं। उन्होंने निम्स हॉस्पिटल की ओर से आयोजित पीडियाट्रिक गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी, हेपेटोबिलेरी, ट्रांसप्लांट एंड न्यूट्रीशियन की इंटरनेशन कॉन्फ्रेस के दौरान भास्कर से विशेष बातचीत में बताया कि .5 प्रतिशत लोग ही पैंक्रियाज का ट्रांसप्लांट करा रहे हैं। इसलिए इसकी सक्सेस रेट काफी ज्यादा है, लेकिन डोनर नहीं मिलने से परेशानी रही है। पाचक ग्रंथि अगन्याशय के लेंगर हेंस ऑफ आइलैप्स पॉइंट होते हैं जिनके नहीं बनने से डायबिटीज काफी बढ़ता है। इन्हें बढ़ाना चुनौती का काम है।







भारत में पोईएम तकनीक अभी नहीं: चिल्ड्रन नेशनल मेडिकल सेंटर, वाशिंगटन के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनिल दरबारी ने बताया कि खाने की नली (ऑसोफेगस) में खाना जमा होने के बाद एंडोस्कोप से बैलून डाला और फुलाया जाता है, लेकिन इसमें काफी रिस्क होती है और कई बार बैलून के फटने से मरीज की जान पर बन आती है, लेकिन अब पीओईएम तकनीक काम में ली जाने लगी है। उम्मीद है कि भारत में शीघ्र ही इस तकनीक से भी ऑपरेशन किए जा सकेंगे। अधिकांश गेस्ट्रो सर्जन बैलून सिस्टम से इलाज करते हैं , लेकिन यह बहुत अधिक सफल नहीं है।



दुनिया में 2.5 एमएम का सबसे छोटा एंडोस्कोप : यूएसए के क्लीनिकल एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मिशेल जे. विल्से ने बताया कि नवजात शिशुओं में आयोडक्ट (नली) को खोलने के लिए एंडोस्कोप डालने से पहले पेट में चीरा लगाना पड़ता है, जो काफी रिस्की था। अब दुनिया में छोटे से छोटे एंडोस्कोप से आमजन के बिना तकलीफ के बेहतर ऑपरेशन किए जा सकते हैं। अभी दुनिया में 2.5 एमएम के एंडोस्कोप काम में लिए जा रहे हैं, जिन्हें बेबी स्कोप कहा जाता है। हालांकि इनसे ऑपरेशन करने के लिए काफी दक्षता चाहिए। भारत में भी इनसे काफी सर्जरी की जा रही हैं।



स्वामी अभिषेक ब्रहमचारी ने कहा कि इस तरह की इंटरनेशल वर्कशॉप में दुनिया भर के डॉक्टर जुटे हैं जिनके आपस में चर्चा से नई तकनीक से इलाज के विकल्प खुलेंगे। छोटे बच्चों की नई तकनीक से सर्जरी और लिवर को री-जेनरेट करने जैसे मुददों पर चर्चा से काफी फायदा होगा। साथ ही आयुष सिस्टम को एलोपैथी से जोड़ने से चिकित्सा व्यवस्थाओं को बेहतर बनाया जा सकता है।

भारत में पोईएम तकनीक शीघ्र ही | चिल्ड्रननेशनल मेडिकल सेंटर, वाशिंगटन के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनिल दरबारी ने बताया कि खाने की नली (ऑसोफेगस) में खाना जमा होने के बाद एंडोस्कोप से बैलून डाला और फुलाया जाता है, लेकिन इसमें काफी रिस्क होती है और कई बार बैलून के फटने से मरीज की जान पर बन आती है, लेकिन अब पीओईएम तकनीक काम में ली जाने लगी है। उम्मीद है कि भारत में शीघ्र ही इस तकनीक से भी ऑपरेशन किए जा सकेंगे।

शिशुओं में आयोडक्ट (नली) को खोलने के लिए एंडोस्कोप डालने से पहले पेट में चीरा लगाना पड़ता है, जो रिस्की था। अब दुनिया में छोटे से छोटे एंडोस्कोप से आमजन के बिना तकलीफ के बेहतर ऑपरेशन किए जा सकते हैं। -डॉ.मिशेल जे.विल्से, यूएसएके क्लीनिकल एसो. प्रोफेसर

इस तरह की इंटरनेशल वर्कशॉप में दुनिया भर के डॉक्टर जुटे हैं जिनके आपस में चर्चा से नई तकनीक से इलाज के विकल्प खुलेंगे। छोटे बच्चों की नई तकनीक से सर्जरी और लिवर को री-जेनरेट करने जैसे मुददों पर चर्चा से काफी फायदा होगा। -स्वामीअभिषेक ब्रहमचारी

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