नाइंथ क्लासतक तो स्कूलों में सब कुछ ठीक रहता है। लेकिन टेंथ में और उसके बाद स्कूलों का माहौल ही अलग होता है। यूं तो साइंस, कॉमर्स और आर्ट्स तीन स्ट्रीम हैं पर हमारे समाज की सदियों पुरानी सोच आज भी नहीं बदली। इंटेलीजेंट बच्चे साइंस ही लेंगे, थोड़े कम कॉमर्स और आर्ट्स उसकी हालत तो किसी से छिपी नहीं। जयपुर के बहुत कम स्कूलों में आर्ट्स है वरना ज्यादातर स्कूलों में साइंस और कॉमर्स से ही काम चल रहा है। जबकि आर्ट और कल्चर का शहर है जयपुर। लिटरेचर फेस्टिवल, थिएटर फेस्टिवल, ट्रेवल फोटो फेस्ट.... अंतरराष्ट्रीय स्तर के कितने प्रोग्राम होने लगे हैं यहां।
सबको लगता है कि बच्चे साइंस के पीछे भाग रहे हैं। जबकि हकीकत ये है कि हम बच्चे नहीं भाग रहे। पेरेंट्स और पीयर प्रेशर का दबाव हमें भागने को मजबूर कर रहा है। टेंथ में हूं मैं और लगभग पूरे साल क्लास में बातों का टॉपिक ही ये था कि साइंस ऑप्ट करनी है। क्यों करनी है ये बहुत कम लोगों को पता है।
जरा सोचिए कि अगर देश को सिर्फ इंजीनियर ही मिलेंगे तो आर्टिस्ट, डॉक्यूमेंट्री मेकर, राइटर्स, पेंटर्स, सैनिक कहां से आएंगे। असल बात यह है कि हर किसी का एडमिशन तो आईआईआईटी जेईई में हो भी नहीं पाता। क्योंकि उनकी प्रोग्रामिंग वैसी हुई भी नहीं है। अगर गलती से हो भी जाए तो सफल नहीं हो सकते और खुश रहने का तो सवाल ही नहीं है। शुक्र है कि मुझ पर कोई दबाव नहीं। अच्छा स्काेर किया है हमेशा, लेकिन आर्ट्स लूंगी। स्कूल मैगजीन के एडिटर्स में से एक हूं। ख्वाब है कि मेरी एक बुक प्रकाशित हो। मेरी निजी लाइब्रेरी है इसमें 1 हजार से ज्यादा बुक्स हैं। लेकिन मैं अपने दिल की इसलिए सुन पाई क्योंकि मेरे पेरेंट्स ने आजाद सोचने की आजादी दी। हर किसी को ये आजादी नहीं मिलती।
स्कूलों में आज भी क्यों है साइंस और कॉमर्स का राज?