वार्ड बॉय-ट्रॉलीमैन में समझौता वार्ता, तीमारदार खींचते रहे ट्रॉली
एसएमएसअस्पताल में मंगलवार को वार्ड बॉय और नर्सिंगकर्मी के बीच हुए झगड़े के बाद बुधवार को वार्ड बॉय और ट्रॉली मैन ने मीटिंग की। अस्पताल ओपीडी के समय की गई मीटिंग के दौरान ओपीडी, ट्रोमा सेंटर और इमरजेंसी में मरीजों को ट्राॅलियां नहीं मिलीं।
मरीजों के परिजन खुद ही ट्राॅलियां खींचते नजर आए। करीब दो घंटे की मीटिंग के बाद चिकित्सा मंत्री के आदेश पर जांच कमेटी गठित करने के बाद वार्ड बॉय और ट्रॉलीमेन काम पर लौटे।
क्या बहिष्कार ही अंतिम विकल्प
अस्पतालमें जब भी किन्हीं दो पक्षों में विवाद की स्थिति होती है, कार्य बहिष्कार कर दिया जाता है। रेजीडेंट, नर्सिंग स्टाफ के बाद अब संविदा नर्सिंगकर्मी भी कार्य बहिष्कार करने लगे हैं। सभी मामले ऐसे थे, जिनमें अस्पताल प्रशासन से वार्ता कर मामले को सुलझाया जा सकता था।
रोज की घटनाएं, मरीज परेशान
एसएमएसअस्पताल में आए दिन स्टाफ के काम बंद करने से मरीजों के परेशान होने की समस्या बढ़ती जा रही है। पिछले एक महीने में ही तीन घटनाएं हो चुकी हैं। इनमें परिजन और डॉक्टर के बीच हुए विवाद, नर्सिंगकर्मियों की ओर से किए गए ढाई घंटे से अधिक समय का कार्य बहिष्कार और अब ट्राॅलीमैन और वार्ड बॉय का कार्य बहिष्कार।
अकेले एसएमएस अस्पताल में ही सफाई, कम्प्यूटर, पार्किंग जैसे कई ठेके हैं। पिछले कई वर्षों से ठेकेदार और कर्मचारी फिक्स हैं और वे ही काम कर रहे हैं। एक ओर जहां ठेकेदारों को टेंडर के माध्यम से मनचाही रकम देनी पड़ती है वहीं दूसरी ओर अस्पताल प्रशासन को सर्विस टैक्स और सर्विस चार्ज भी देना पड़ता है। एसएमएस अस्पताल के पूर्व प्रिंसीपल डॉ. सुभाष नेपालिया ने इस ठेका सिस्टम को बंद कर स्वयं अस्पताल प्रशासन को कार्य कराने की अनुशंसा की थी। उन्होंने एक सर्वे कराया और तथ्य जुटाए कि अस्पताल में जितने भी ठेका कर्मी हैं, वे करीब दस वर्षों से कार्य कर रहे हैं। अस्पताल के कर्मचारियों की संख्या के अनुसार अस्पताल को 46 लाख रुपए टैक्स देना पड़ता है। यदि अस्पताल प्रशासन ठेके ना देकर अपने स्तर पर इन कर्मचारियों से काम कराए तो लाखों रुपए की बचत की जा सकती है।
ना पीएफ, ना ईएसआई
अस्पतालमें कई ऐसे ठेकेदार हैं, जो तो कर्मचारियों का पीएफ कटा रहे हैं और ना ही सर्विस टैक्स दे रहे हैं।