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दो साल की पीएचडी और अप्रूवल में लग गए 3 साल

5 वर्ष पहले
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इससूची में वेद, ज्योतिष, साहित्य, धर्म शास्त्र, दर्शन व्याकरण और शिक्षा से जुड़े शोध शामिल है। गाइड्स शोधार्थियों का कहना है कि नियम अनुसार सितंबर 2015 तक उनकी पीएचडी पूरी हो जानी चाहिए थी। अगर इसी धीमी रफ्तार से वे रिसर्च करेंगे तो उनका काम कम से कम 2017 तक पूरा होगा। यानी की यूनिवर्सिटी की धीमी रफ्तार के कारण उनकी रिसर्च का कैरियर दो साल पीछे चल गया है। ऐसे शोधार्थियों की संख्या 30 से अधिक है।

यहांहुआ नियमों का उल्लंघन

अगस्त2013 में पीएचडी के आवेदन मांगे गए। शोधार्थियों ने आवेदन किए। नियम अनुसार 2013 में रजिस्ट्रेशन से लेकर डीआरसी से संबंधित काम होना था लेकिन ये काम समय पर नहीं हुआ। मार्च 2014 तक कोर्स वर्क का काम पूरा होना था लेकिन ये काम सितंबर 2014 तक हुआ। इस कोर्स वर्क का परिणाम अक्टूबर 2010 में आया हालांकि इस बीच कई शोधार्थियों को रजिस्ट्रेशन का प्रोसेस ही नहीं कराया गया। रजिस्ट्रेशन कराए बगैर कोर्स वर्क कराना नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में था। इस संबंंध में पिछले दिनों कुलपति से लेकर शिक्षामंत्री तक शिकायत भी हुई।

अन्य विश्वविद्यालयों से जुड़ी रिसर्च की तुलना में शोधार्थी दो साल पीछे

एजुकेशन रिपोर्ट. जयपुर | जगद्गुरुरामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत यूनिवर्सिटी में संस्कृत और पांडुलिपियों से जुड़ी रिसर्च की रफ्तार इतनी धीमी है कि जो रिसर्च पीएचडी का काम दो साल में पूरा होना चाहिए था, उस रिसर्च की शुरुआत कराने में संस्कृत यूनिवर्सिटी ने तीन साल लगा दिए है। संस्कृत यूनिवर्सिटी ने गुरुवार को तीन साल पुराने रिसर्च आवेदनों पर डिपार्टमेंट रिसर्च कमेटी (डीआरसी) की अप्रूवल जारी की है। अब ये छात्र शोध कार्य तो शुरू कर सकेंगे लेकिन अन्य विश्वविद्यालयों से जुड़ी रिसर्च की तुलना में ये शोधार्थी दो साल पीछे हो गए है।

^मामलामेरे कार्यकाल से पहले का था। समाधान कराकर शोधार्थियों को फायदा दिया जा रहा है। हमारा मकसद रिसर्च को बढ़ावा देना है। धीरे-धीरे कमियां दूर होगी। -प्रो.विनोद शास्त्री, कुलपति संस्कृत यूनिवर्सिटी

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