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जेनेटिक डिफेक्ट की वजह से सामान्य लंबाई भी नहीं बढ़ पाती है। हाइट कम रह जाती है। कई बार पीरियड भी नहीं आते।

4 वर्ष पहले
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सोलह साल की उम्र तक बेटी के पीरियड शुरू नहीं हो पा रहे हैं तो पेरेंट्स इसे अवॉइड नहीं करें। पीरियड शुरू नहीं होने पर कई तरह की प्रॉब्लम हो सकती है। वहीं, पीरियड शुरू नहीं होनेे की कुछ वजह ऐसी होती है, जिनके बारे में पेरेंट्स को जानकारी नहीं होती है। वे इसे साधारण बात मानते हुए पीरियड शुरू होने का इंतजार करते रहते हैं, जो एक बड़ी प्रॉब्लम भी बन सकती है, इसलिए समय पर ही इस प्रॉब्लम की वजह डायग्नोस करके इलाज शुरू करवाया जाना चाहिए।

डॉक्टर्स के मुताबिक, पीरियड नहीं आने की मुख्य वजह जेनेटिक डिफेक्ट होता है। जेनेटिक डिफेक्ट के कारण बच्ची का यूट्रस नहीं बन पाता है। यूट्रस नहीं बन पाने से बच्ची में प्यूर्बिटी के बदलाव नहीं पाते हैं। ना ही पीरियड शुरू हो पाते हैं। इसके अलावा टर्नर सिंड्रोम एक्सओ होने पर भी पीरियड शुरू नहीं होते हैं। इस जेनेटिक डिफेक्ट की वजह से सामान्य लंबाई नहीं बढ़ने से हाइट कम रह जाती है। कई बार पीरियड आते ही नहीं हैं। या फिर देरी से आते हैं। कई बार क्रीप्टो मीनेरियो यानी यूट्रस में रुकावट आने पर भी ऐसा होता है। इंडिया में यूट्रस की टीबी होना बहुत ही सामान्य प्रॉब्लम है।

प्लेयर में रिगरस एक्सरसाइज और स्ट्रेस से भी नहीं आते पीरियड

जिनलड़कियों में सोलह साल की उम्र से पहले टीबी की बीमारी हो जाती है, उनमें यूट्रस की वॉल आपस में चिपक जाने पर पीरियड्स नहीं पाती है। इसलिए टीबी डायग्नोस होते ही इसका जल्द इलाज शुरू करवाया जाना चाहिए। ओवरी में ट्यूमर होने पर भी पीरियड शुरू नहीं हो पाते हैं। यदि बच्ची प्लेयर है और वह रिगरस एक्सरसाइज कर रही है। या फिर स्ट्रेस में रहती है। खेलने-कूदने के कारण भी पीरियड नहीं पाते हैं। या पीरियड बंद हो सकते हैं। बच्ची का अचानक से स्थान बदल गया है। उसने हॉस्टल में रहना शुरू कर दिया है। यदि वह हॉस्टल में स्ट्रेस में रहती है तो भी उसे यह प्रॉब्लम हो सकती है। हाइपोथैलेमस, प्यूटिटिरी, ओवेरियन ब्रेन से रेगुलेट होते हैं। स्ट्रेस में रहने की वजह से इन पर सीधा असर पड़ता है।

कैसे कर सकते हैं डायग्नोस

रुटीनब्लड टेस्ट और हॉर्मोंस की स्टडी करके इस प्रॉब्लम की वजह मालूम की जाती है। टैस्ट में एसएलएच, एसएफएस और थॉयराइड का भी टैस्ट करवाया जाता है। इनकी वजह से भी पीरियड में प्रॉब्लम हो सकती है। इसके अलावा अल्ट्रसाउंड, चेस्ट एक्स-रे, केरियोटाइपन क्रोमोजोम स्टडी भी की जाती है। डायग्नोसिस कंफर्म करने के लिए दूरबीन से जांच भी करते हैं। इसके बाद ट्रीटमेंट शुरू किया जाता है। यदि यूट्रस में ब्लड इकट्ठा हो चुका है तो इस रुकावट को हटा दिया जाता है। थॉयराइड डिसफंक्शन और टीबी होने पर ट्रीटमेंट शुरू करते हैं। यदि पीसीओडी है और वह ओबीज है तो उसकी डाइट में बदलाव किए जाते हैं। ताकि उसका वजन कम करवाया जा सके।

जेनेटिक डिफेक्ट्स से 16 साल की उम्र में शुरू नहीं होते पीरियड

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