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सिटी रिपोर्टर } आजहम सिटी भास्कर में देश की चार

5 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर } आजहम सिटी भास्कर में देश की चार एसिड सर्वाइवर्स की रियल स्टोरी लेकर आए हैं जो स्टॉप एसिड अटैक अवेयरनेस के लिए मैराथन में शामिल होने जयपुर आईं। उन्होंने अपने स्वाभिमान के लिए आवाज उठाई, गलत बात मानने से इंकार किया और अपना फैसला लिया। उनकी आवाजों को दबाने की कोशिश उनके चेहरे पर एसिड फेंककर की गई। लेकिन निडर और बुलंद हौसलों से आगे बढ़ती रहीं। वे आज भी अपने सपनों को लेकर अडिग हैं। फिलहाल ये आगरा उदयपुर के शिरोज कैफे में काम कर रही हैं जो एसिड सर्वाइवर्स ही चलाती हैं।

झुलसा चेहरा देखकर नौकरी नहीं देते थे

37साल की मधु बताती हैं, फिलहाल आगरा में शिरोज कैफे के साथ काम कर रही हूं। 1997 की बात है, मैंने 12वीं पूरी की थी। बड़ी होकर इंस्पेक्टर बनना चाहती थी। पड़ोस का एक लड़का अकसर शादी का दबाव बनाता था। मना करने पर कॉलेज में एडमिशन के लिए जाते वक्त सुनसान रास्ते पर एसिड फेंका। मां ने जेवर बेचकर मेरा इलाज कराया और आगे पढ़ाया। शादी के लिए प्रस्ताव आया तो मां ने कहा एक बार बेटी को देख लो। लड़के ने जवाब दिया अगर शादी के बाद मेरी प|ी के साथ ऐसा होता तो क्या मैं इसे घर से बाहर निकाल देता। हमसफर तो मिल गया लेकिन यह अहसास हो गया कि जॉब भी फेस वैल्यू पर निर्भर होती है। मैं जब भी जॉब के लिए बाहर इंटरव्यू देकर आती वो मुझे देखकर बात टाल देते। कहीं जॉब मिलती भी तो सैलरी काट लेते थे।

लगता है सिंड्रेला ही जैसी थी मेरी किस्मत

फैशनडिजाइनर रूपा 24 साल की हैं और मानती हैं कि उनकी किस्मत शायद सिंड्रेला जैसी है जिसे सौतेली मां ने एसिड फेंककर कुचलने की कोशिश कीं। वो कहती है, मुझे हमेशा से कपड़े डिजाइन करने का शौक था इसलिए अटैक के बावजूद फैशन डिजाइनर का सपना राख नहीं होने दिया। साथ ही आगरा के शिरोज कैफे में काम कर रही हूं। बहुत छोटी थी तब मां गुजर गई। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली। सौतेली मां ने कभी नहीं अपनाया। वे सुबह 4 बजे उठा देतीं, खाना नहीं देती थीं। उनके एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर के बारे में मुझे पता था। उन्हें डर था मैं किसी और को ना बता दूं। 2008 में रात को मुझ पर एसिड फेंका। मेरा चेहरा कंधे एसिड से डेमेज हो चुके हैं। चाचाजी ने मेरा इलाज करवाया। 4 साल से स्टॉप एसिड अटैक के साथ जुड़ी हूं।

मैं एक आंख से भी देखती हूं हजारों सपने

हमेशासे बिंदास, मस्तमौला रही 19 साल की अंशु राजपूत बड़ी होकर जरूरतमंदों की मदद करना चाहती थी। खो-खो कबड्डी की डिस्ट्रिक्ट लेवल खिलाड़ी रही। टेंथ क्लास में पढ़ती थी, पड़ोस में रहने वाला 55 साल का शख्स अकसर परेशान करता। 2014 में रात को सोते वक्त एसिड फेंका। एसिड अटैक से मेरी आंख, गला हाथ डेमेज हो चुके हैं। एक आंख से देख भी नहीं सकती। दूसरी आंख पर ज्यादा जोर देने पर आंखों से खून बहता है। अपना चेहरा जब आईने में देखती हूं तो टूट जाती हूं। लेकिन दर्द के उन टुकड़ों को समेट कर एक बार फिर मशाल बन जाती हूं यह साबित करने के लिए कि मैं फिर खड़ी हो सकती हूं। फिलहाल बीए रेगुलर कर रही हूं और बाइक राइडिंग मेरा शौक है।

आज भी समझ नहीं पाए कि ना कहने का हक है हमें?

27साल की शबनम कहती हैं, पढ़ाई में आगे थी इसलिए स्कूल टीचर गोद लेकर अच्छी परवरिश देना चाहती थी। परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी। इसलिए फैक्ट्री में कढ़ाई कर परिवार को सपोर्ट करती थी। 2005 में 15 साल की थी जब मुझ पर फैक्ट्री कॉन्ट्रेक्टर ने एसिड फेंका जो मुझ पर शादी का दबाव बनाया करता था। जॉब छोड़ने के कुछ महीनों बाद रात के 1:30 बजे सोते वक्त एसिड फेंका। एसिड सेे चेहरा, गला और हाथ जल गया। अब तक 11 ऑपरेशन हो चुके हैं। लेकिन मैं आज भी नहीं समझ पाई कि ना कहना मेरा हक है फिर इसकी सजा क्यों मिली? 2010 में मेरी शादी हुई। आज सिर उठा कर कैफे में काम करती हूं। उदयपुर कैफे में कस्टमर्स से मिलना-जुलना, बातें करना, स्वाभिमान के साथ जीना हमारी जिंदगी का हिस्सा है।

मधु, शबनम, रूपा अंशू राजपूत।

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