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लाखों में बिकता है ये 'काला जहर', पढ़ें कैसे खेत से नसों तक पहुंचता है

5 वर्ष पहले
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जयपुर. राजस्थान में अफीम के साथ-साथ खेतों में तस्करों की जड़ें भी पनपती हैं। तस्करों की नजरें खेतों में अफीम के बीज पड़ते ही वहां जम जाती हैं। यूं तो अफीम की खेती सरकारी एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स की देखरेख में होती है, लेकिन डोडे में चीरा लगते ही तस्कर और भी ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। जानिए खेत से नसों तक कैसे पहुंचता है काला जहर...
भास्कर की ओर से एक दिन पहले किए गए नशे के तस्करों के नेटवर्क के खुलासे के बाद अब अफीम की खेती और तस्करों के इस तक पहुंचने का सच...
- अफीम यानी काला जहर। इसके फूल सफेद होते हैं। प्रतापगढ़ के गांवों में इसकी खेती जोरों पर चल रही है।
- कुछ चुनिंदा गांवों में ही डोडे(अफीम के फूल के नीचे उगने वाला हिस्सा) निकालने का काम होता है।
- तहकीकात में सामने आया कि तस्करी का नेटवर्क इन्हीं के खेतों के इर्द-गिर्द घूमता है।
- खेत में तैयार अफीम पर सबसे पहले सरकार का हक होता है, लेकिन सरकार को तय स्टॉक देने के बाद कई किसान बची हुई अफीम तस्करों के हवाले कर देतेे हैं।
- तस्करों को बेचने के लिए अफीम को सीक्रेट रूप से जमीन में दबा कर रखा जाता है।
- अफीम की सरकारी खरीद तो 1700-2500 रु. किलो के बीच है, लेकिन किसान को तस्करों से एक लाख रुपए प्रति किलोग्राम की आमदनी होती है।
- इसी लालच ने अफीम तस्करों की खेत तक घुसपैठ कर दी। वे यहीं से अफीम जुटाते हैं।
- कई गांवों के बारे में भी पता चला, जिनमें प्रतापगढ़ जिले के बसाड़ और नौगांव प्रमुख थे।
मिलावटी अफीम भी थमा देते हैं
- नशे की इस मंडी में ग्राहक देखकर माल तय होता है।
- जानकार लोगों को असली अफीम की खेप दी जाती है जबकि अनजान और नए लोगों को मिलावटी पकड़ा दी जाती है।
- इनमें बच्चों के दूध के साथ पिए जाने वाले बॉर्नविटा, बूस्ट, कॉम्प्लान और काॅफी पाउडर जैसी चीजें मिला दी जाती हैं।
- साथ ही नशीली दवाएं मिलाकर आधा किलो अफीम को दो से ढाई किलो तक बना दिया जाता है।
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स की रिपोर्ट
- राजस्थान में 17044 किसानों के पास अफीम उत्पादन का पट्टा।
- देश में 34973 किसानों के पास हैं अफीम उत्पादन का लाइसेंस।
- मप्र लाइसेंस के मामले में है नंबर 1 वहां 17781 लाइसेंस।
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