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जयसिंह ने युद्ध में जीती दौलत जयपुर को बसाने में की खर्च

5 वर्ष पहले
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जयपुर. जयपुर और आमेर तथा आसपास के इलाके ढूण्ढार कहलाते हैं और इस क्षेत्र में बोली जानी वाली बोली ढूंढारी कहलाती है। सोता, सानी, कंथली और बनास नदियों के बीच के क्षेत्र को ढुण्ढार कहते हैं। ढूण्ढार क्षेत्र उत्तर के कोटपूतली, पूर्व में बैराठ और सवाई माधोपुर, टोंक और मालपुरा होते हुए दक्षिण में सांभर और पश्चिम में शेखावती को छूता है।
ढूण्ढार नाम ढूण्ड नदी से पड़ा जो तब बारामासी नदी थी। लेकिन कुछ विद्वान् यह मानते हैं कि पौराणिक काल में एक दैत्य ढूण्ड्ढसार के नाम पर पड़ा जिसका कभी यहां राज था। पत्थर से बने हथियार जो बैनाड़ा, झालाना, अचरोल, नीम का थाना, गणेश्वर और चाकसू में पाए गए हैं वह इस क्षेत्र को सिन्धुघाटी की सभ्यता से जोड़ते हैं। कोटपूतली के पास जाेधपुरा गांव में ईसा पूर्व 2000 से बर्तन पाए गए हैं। निवाई, गणेश्वर, साम्भर, नालियासर में पाए गए सिक्के आदि यह बताते हैं कि ढूण्ढार का क्षेत्र 2000 वर्ष पूर्व बसा था।
जयपुर का परिवार कच्छावावंशी है। कहते हैं कि राम के पुत्र कुश का ही वंशज है जयपुर राजपरिवार। कुश पहले राजपूत थे जिन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित किया। भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज ही पहले कुशवाहा और ढूण्ढार पहुंचते-पहुंचते मीणाओं ने उन्हें नाम बिगाड़ते हुए कच्छावा बना दिया। कभी ग्वालियर के राजा रहे नल के वंशज राजा सोधदेव के बेटे दुल्हाराय ने खो गांव में, जो जयपुर के निकट है, मीणाओं को परास्त कर दिया। इसके बाद दौसा के बड़गुजर राजा की बेटी से उसका विवाह हुआ और दौसा की जागीर दहेज मेें मिली। दुल्हाराय के निधन के बाद उनके बेटों ने जमुवा रामगढ़, काली खो और आमेर तक अपनी रियासत बढ़ा ली। कच्छावा वंश की ताकत पांचवीं पीढ़ी में आकर बढ़ने लगी। दुल्हाराय के वंशज पजवन देव ने शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी को खैबर दर्रे में ऊंची पहाड़ियों पर हुए युद्ध में मात दी थी। इसके बाद पजवनदेव के वंशज राजा पृथ्वीराज (1503-1520) राणा सांगा से मिलकर बाबर से लड़े।
राजा भाड़मल (1547-1573) से कहानी शुरू होती है अकबर से दोस्ती की। मुगलों से सांठ-गांठ कर उनके लिए सेना का कार्य करने की शुरुआत राजा भाड़मल से हुई। भाड़मल का बेटा भगवन्तदास और उनका बेटा मानसिंह हुआ जिसने तथाकथित अपनी बहन जोधाबाई की शादी अकबर से की। बदले में वह अकबर का सेनापति बन गया और मुगलकाल में उसकी गिनती बड़े योद्धाओं में होने लगी।
जयसिंह दक्षिण में विजय प्राप्त कर मालवा का गवर्नर बन चुका था और मुगलों की आपसी लड़ाई भड़काने में भी वह कामयाब रहा। जयसिंह ने राजा मानसिंह के बाद आमेर के शासकों की दौलत बढ़ाई थी। मुगल सल्तनत छिन्न-भिन्न होने लगी थी। अपार धन अर्जित करने के बाद उसे ढंग से ठिकाने लगाना जरूरी था। एक शंका यह भी थी कि मुगल सेनाएं मराठों को साथ लेकर हमला कर दे तो सारा कमाया धन लुट जाएगा। जयसिंह आमेर के राजप्रासाद के डागले (छत) पर खड़े होकर जब अपनी राजधानी को देखते तो इस बात का अफसोस होता कि आमेर की हरी भरी पहाड़ियां जहां सुरक्षा के लिए उत्तम हैं वहीं आमेर के विस्तार में बाधक भी। उसने कई देशी-विदेशी आर्किटेक्ट को अपने सपनों का शहर बसाने के लिए नक्शा बनाने को कहा।
जयसिंह के पास बंगाल से आया विद्याधर चक्रवर्ती तो था ही जिसके पास जयसिंह की सोच को अंजाम देने की क्षमता थी तो आनन्द राम कुमावत जैसा मिस्त्री भी था जो नक्शे को मूर्त रूप दे सकता था। जयसिंह ने कोपरनिकस, गैलिलियो और पुर्तगाल के इमैनुएल के शिल्पशास्त्र का अध्ययन किया। चीन के शहरों और बगदाद के बसने की कहानी भी जयसिंह ने सुनी और जन्तर-मन्तर बनाने की उन्होंने ठान ली। जयसिंह ने कई बार नक्शों में फेरबदल कर आखिरी नक्शा बनाया और इस नक्शे को विद्याधर और मिस्त्री आनन्दराम को दे दिया। यहां से शुरू होती है जयपुर को बसाने की जुगत।
जयसिंह के खास सलाहकारों में थे जैन समुदाय के कई लोग
सवाई जयसिंह जैसा विद्वान कोई दूसरा शासक देश में नहीं था। अरबी, फारसी, संस्कृत के अलावा यह अंग्रेजी का भी थोड़ा बहुत ज्ञान रखता था। वे जजिया कर के विरोधी थे।
वह आमेर में बसे जैन समुदाय से बड़ा प्रभावित थे। जैन जहां सुसंस्कृत और राजा के वफादार होते थे वहीं अपनी व्यापारिक क्षमता से धन कमाने की योग्यता रखते थे।
जयसिंह के खास सलाहकारों में कई जैन थे। जयसिंह के रत्नों में पंडित जगन्नाथ सम्राट, केवलराम भोडूम्बर, रत्नाकर पुण्डरिक, ब्रजनाथ, गोकलनाथ भट्ट और कृष्ण भट्ट जैसे नवरत्न थे। भट्ट लोग आज के तेलंगाना क्षेत्र से आमेर बुलाए गए थे। पुण्डरिक महाराष्ट्र से आए थे। राजामल, जयसिंह का दीवान और दलाराम, जिसके नाम पर दलाराम का बाग है, चीफ इंजीनियर थे।
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