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हमारी भावना में तैरता मधुगान है हिंदी

7 वर्ष पहले
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कृतिकार की मासिक काव्य गोष्ठी

सिटी रिपोर्टर जयपुर

कृतिकारकी मासिक काव्य गोष्ठी इस बार हिंदी दिवस को समर्पित की गई। मुकुट सक्सेना की अध्यक्षता में आयोजित इस गोष्ठी की शुरुआत सुरेंद्र शर्मा की सरस्वती वंदना से हुई। इस मौके पर शहर के कवियों और शायरों ने हिंदी का गुणगान करती अनेक मनोभावों से सराबोर रचनाओं से तीन घंटे से भी अधिक समय तक काव्य अनुरागियों को बांधे रखा। गोष्ठी की चुनिंदा रचनाएं...

सुरेंद्रशर्मा : हमारीआस्था विश्वास की पहचान है हिंदी, हमारी भावना में तैरता मधुगान है हिंदी। हमारी सभ्यता का इक अमिट सोपान है हिंदी, हमारी भावनाओं की मधु मुस्कान है हिंदी।।

गोपीनाथगोपेश : संस्कृतिरक्षक, परम पुनीता, हिंदी तेरी जय हो, जन मानस बनी विनीता, हिंदी तेरी जय हो। हम सब नमन करें तुमने ही हमको सदा जगाया, एक सूत्र में बांधने का मां, हमको पाठ पढ़ाया।। अंधियारों को तुमने जीता, हिंदी तेरी जय हो।

रजाशैदाई : शेरोंमें कभी मेरे नफासत नहीं होती, हिंदी से अगर मुझको, मोहब्बत नहीं होती। जख्मों से फरोजां जो रहा करता है हरदम, उस दिल को उजालों की जरूरत नहीं होती।।

गोविंदभारद्वाज : हिंदीमेरा नाम है, मैं हिंदोस्तानी। दुष्यंत की गजल हूं मैं, मुंशी की कहानी।।

शोभाचंदर पारीक : मेरेअधरों की मुस्कानें, मेरे नयनों की अभिलाषा, भावों की जननी तू मेरे बोलों की है भाषा। मैंने बैठ गोद में तेरी, पार क्षितिज के जाना सीखा।। तेरी सांसों की थिरकन से दूर गगन को पाना सीखा। तू मेरे गीतों की गुंजन, तू मेरे सपनों की आशा।।

विजयमिश्र दानिश : वोगुलामी को ही शान समझता है, मांगे हुए तमगों को ही सम्मान समझता है। पाने की तमन्ना में आकाश की ऊंचाई, इनसान जमीं को ही बेजान समझता है।

सत्यचंदन : आखिरमें ये लगा कि मुकद्दर का खेला था, यूं ही तमाम उम्र किसी से खफा रहे। जाने वो आज कितने ही रिश्तों में बंट गया, जिसको मैं चाहता था कि केवल मेरा रहे।।

चंद्रप्रकाश चंदर : तेरानगमा है या कयामत है, झूम उठी चमन की हर डाली। जब भी शिकवा किया कोई मैंने, हर खता उसने मेरे सिर डाली।