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मोदी की लहर कम हुई है वसुंधरा का जादू

7 वर्ष पहले
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तीन सांसदों के नंबर घटे, जीत से बिरला की पकड़ बढ़ेगी

भाजपा को मिला सबक, कांग्रेस को ऑक्सीजन

1952 के बाद उपचुनाव में पहली बार सत्तारूढ़ दल को बड़ा झटका

प्रदेशकी चार विधानसभा सीटों के लिए हुए इस उप चुनाव ने पिछले 62 साल के राजनीतिक ट्रेंड को बदल दिया है। प्रदेश में विधानसभा चुनाव के एक या दो साल बाद जितने भी उप चुनाव हुए हैं उनमें सत्तारूढ़ पार्टी को ही फायदा मिलता रहा है लेकिन इस बार परिणाम इसके उलट आए हैं। 1952 में पहली विधानसभा की 14 सीटों के उप चुनाव हुए जिनमें 12 सीटें सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस की झोली में गईं। प्रदेश में 1951 से लेकर 1972 तक एक ही पार्टी की सरकार रही। इस दौरान जितने भी उप चुनाव हुए उनमें कांग्रेस को ही फायदा मिला। आपातकाल के बाद प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी ऐसे में 1978 में दो सीटों के लिए हुए उप चुनाव में ये दोनों सीटें जनता पार्टी के खाते में गईं।

इसहार के ये रहे कारण

इननतीजों के पीछे मंत्रिमंडल विस्तार में हुई देरी, मंत्रियों के विवादास्पद बयान और निशुल्क दवा, पेंशन जैसी योजनाओं की अनदेखी को बड़ा कारण माना जा रहा है।

कोटा दक्षिण : जीत से बिरला का कद बढ़ा

कोटादक्षिण सीट पर चुनाव की सारी कमान सांसद ओम बिरला ने संभाल रखी थी। जीत का अंतर भले ही आधा कम हो गया हो, लेकिन भाजपा अपना गढ़ बचाने में सफल रही। यहां पंचायती राज मंत्री गुलाबचंद कटारिया और राज्यसभा सांसद एवं प्रदेश महामंत्री नारायण पंचारिया ने सत्ता और संगठन की तरफ से मोर्चा संभाल रखा था। ऐसे में दोनों के लिए भी यह जीत इज्जत बढ़ाने वाली है। यह सीट ओम बिरला के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बनी हुई थी। इस जीत से बिरला को राहत मिली होगी।

नसीराबाद : तीन मंत्री डटे रहे

नसीराबादसीट पर ऊर्जा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर, जलदाय मंत्री सांवर लाल जाट और कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी को जिम्मेदारी सौंप रखी थी। यहां भाजपा संगठन से प्रदेश महामंत्री और सांसद हरिओम सिंह राठौड़ कमान संभाल रहे थे। यहां भाजपा प्रत्याशी 386 मतों से चुनाव हारे।

वैर : सराफ के जिम्मे था प्रबंधन

भरतपुरकी वैर सीट पर शिक्षामंत्री कालीचरण सराफ और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्यमंत्री डाॅ. अरुण चतुर्वेदी को चुनावों में प्रबंधन का जिम्मा सौंप रखा था। संगठन की तरफ से महामंत्री बाबूलाल वर्मा जिम्मा संभाल रहे थे। यहां भ