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अरविंद पनगडि़या और डॉ. अशोक पनगडि़या

6 वर्ष पहले
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डिकल फील्ड में डॉ.अशोक पनगड़िया आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं, वहीं उनके भाई अरविंद पनगड़िया कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रह चुके हैं। साथ ही नेशनल इनिशिएटिव ऑफ ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (एनआईटीआई) के पहले डिप्टी चेयरमैन हैं। ये इत्तफाक है या जेनेटिक फिनोमिना कि दोनों को ही देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा जा चुका है। डॉ. अशोक कहते हैं, ‘ये हमारे पिता की सीख है। वे कहते थे, जो भी फील्ड चुनो उसमें बेस्ट बनो। फिर चाहे वो बूट पॉलिश करना ही क्यों ना हो। आज पिताजी की सीख का नतीजा सामने है।’

आपकेपिता ने आपकी पर्सनैलिटी को कितना प्रभावित किया?

अशोकने कहा,‘मेरे पिता बाबूलाल जी अपने गांव में ग्रेजुएट होने वाले पहले व्यक्ति थे। गांव में कोई स्कूल नहीं था। ऐसे में घर से 5 किमी दूर पढ़ने जाया करते थे। वह भी तब जब वे महज 5 साल के थे। वे अपने आप में एक लर्निंग स्कूल थे। फ्रीडम फाइटर भी रहे और आजादी के बाद गवर्नमेंट जॉब में आए। हम तीन भाई हैं जब मैं छठी क्लास में था तब उन्होंने तय कर लिया था कि पहले बेटे रवि को इंजीनियर बनाएंगे। दूसरे यानी मुझे मेडिकल में भेजेंगे और अरविंद को ब्यूरोक्रेट बनाएंगे।’

लेकिनअरविंद ने ब्यूरोक्रेसी जॉइन नहीं की?

1973-74में वो आईएएस की तैयारी कर रहे थे। इसी बीच उन्हें प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में पीएचडी का ऑफर मिला। आईएएस में रिटन क्लियर के बावजूद इंटरव्यू में नहीं बैठे और पीएचडी की। अब देखिए प्लानिंग कमीशन की जगह आने वाले नेशनल इनिशिएटिव ऑफ ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया के पहले वाइस चेयरमैन भी बनने वाले हैं। जब वो विदेश जा रहे थे तब बहुत बुरा लगा था, लेकिन आज उनकी कामयाबी देखकर बहुत खुशी है।

आपमें किस तरह की बॉन्डिंग हैं?

खिलखिलाकर अशोक कहते हैं, ‘बचपन में तो हम दोनों एक-दूसरे के कॉम्पीटीटर हुआ करते थे। महावीर पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे। दोनों अलग-अलग हाउसेस में थे। दोनों को डिबेट का शौक था। अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते थे। हां, बचपन में वो ज्यादातर मुझसे जीतते थे, लेकिन दोनों अच्छे दोस्त भी थे। आज भी हैं। आज अलग-अलग शहरों में रहते हैं, लेकिन रोजाना बात किए बिना हमारा दिन पूरा नहीं होता।’

बीतेवक्त की कौनसी चीजें याद आती हैं?

1958के दौर की बात है। स्कूल आने-जाने के लिए पिताजी ने रिक्शा लगवाया, लेकिन हम पैदल स्कूल जाया करते थे। उन पैसों को बचाकर किताबें खरीदते थे। ये बचपन के उस शौक का नतीजा है कि दोनों ही ऑथर्स भी हैं।

ऐसाकोई सपना जो पूरा करना है?

न्यूरोसर्जनहूं। रोजाना अलग-अलग मरीजों से मिलता हूं। मैं मस्तिष्क ज्ञान को अध्यात्म से जोड़ना चाहता हूं क्योंकि मैंने करिश्मे होते हुए भी देखे हैं। इसी विषय पर किताब लिखना चाहता हूं।

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भीलवाड़ाके एक छोटे से गांव से निकलने वाले डॉ. अशोक पनगड़िया और अरविंद पनगड़िया अपने टैलेंट के बल पर आज जयपुर ही नहीं, पूरे देश में जाने जाते हैं। पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित इन दोनों भाइयों से जयपुर पोस्ट रिपोर्टर ने की बातचीत। डॉ.अशोक पनगड़िया प्रोफेसर एमेरिटस न्यूरोलॉजी और चीफ मिनिस्टर एडवाइजरी काउंसिल के मेंबर हैं। उनके छोटे भाई अरविंद पनगड़िया एनआईटीआई के डिप्टी चेयरमैन हैं।