जयपुरकथक केंद्र क
रूहानी रक्स | सुरेंद्रसैंकिया ने दशावतार से कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए बशीर बद्र के कलाम - कभी यूं मेरी आंख में के मेरी नजर को खबर ना हो, मुझे एक रात नवाज दे मगर उसके बाद सहर ना हो... पर भक्तिभाव में डूबकर नृत्य किया।
जयपुरकथक केंद्र की ओर से जेकेके में आयोजित दो दिवसीय कथक समारोह के दूसरे दिन कलाकारों ने रक्स अर्थात नृत्य के दो रूपों का मनमोहक रूप दर्शाकर कथक प्रेमियों को अपने मोहपाश में बांध लिया। लखनऊ से आए सुरेंद्र सैंकिया ने रूहानी रक्स का प्रदर्शन किया, जबकि दिल्ली की गीतांजलि लाल के रक्स में लय-ताल के साथ भाव मुद्राओं में मुगल कालीन नृत्य का अंदाज देखने योग्य था। इस मौके पर नलिनी कमलिनी का भी नृत्य हुआ। उन्होंने ऋतुओं के सौंदर्य और ब्रज की होरी के उल्लास का चित्रण किया।
फिर हुई जुगलबंदी
समारोहमें नलिनी कमलिनी की जुगलबंदी भी देखने योग्य थी। इन कलाकारों ने चंद्रमणि ललाट रचना के माध्यम से शिव का रौद्र रूप दर्शाया। यह रचना राग शंकरा, भोपाली और मालकौंस पर आधारित थी। बारहमासा में उन्होंने छह ऋतुओं के सौंदर्य का वर्णन किया। उनके नृत्य में फुट वर्क और संगतकारों कलाकारों के बीच का बेहतरीन समन्वय था। इससे पूर्व कथक केंद्र की ओर से कलाकारों का अभिनंदन किया गया।
लय-ताल का रक्स
गीतांजलिलाल ने भगवान शिव के सौंदर्य का वर्णन करती रचना से कार्यक्रम की शुरुआत की। उसके बाद लय, ताल और मुगलकालीन तहजीब से सराबोर रक्स के जरिए साधना का बेहतरीन परिचय दिया। इसी प्रस्तुति में उन्होंने 16 मात्रा की तीन ताल में लय-ताल की कैमिस्ट्री पेश की। इसमें विभा लाल और अभिमन्यु लाल ने भी उनका साथ दिया। उन्होंने राग अहीर भैरव में प्रेम की अनुभूति करवाती रचना भी पेश की।
Cultural Eve
}एक में भाव तो दूसरे में नजर आया लय-ताल का खूबसूरत अंदाज
कथक से छलके रक्स के दो रूप