थिएटर मेरा घर, फिल्में फार्महाउस
सिटी रिपोर्टर जयरंगमफेस्टिवल में अपना नाटक ‘सर सर सरला’ लेकर आए मकरंद देशपांडे ने मंचन से पहले जवाहर कला केंद्र में एक चर्चा में अपनी जिंदगी और अभिनय के अनछुए पहलुओं पर बात की।
अभिनयकी शुरुआत कैसे हुई?
अचानक।थिएटर में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन एक्टिंग का शौक था। यही शौक मुझे इस फील्ड में ले आया। पता नहीं चला कि शौक-शौक में कब एक्टर बन गया। फिर लेखक, निर्देशक बनता-बनता फिल्म प्रोड्यूसर भी बन गया। मेरी पहली फिल्म 1987 में आई ‘कयामत से कयामत’ थी।
पहलीपसंद थिएटर है या फिल्में?
थिएटरमेरा घर है, जबकि फिल्में फार्महाउस। थिएटर की थकान दूर करने के लिए फिल्मों का रुख उसी तरह करता हूं जिस तरह एक थका-मांदा व्यक्ति फार्महाउस पर खुद को रिफ्रेश करता है। फिल्में मेरी रोजी-रोटी का भी जरिया हैं। इससे कमाया हुआ पैसा थिएटर में लगाता हूं।
भारतमें हिंदी नाटकों की मौजूदा हालत के बारे में राय?
नाटकदर्शकों से पनपते हैं और दर्शक कॉमर्शियल थिएटर से। हिंदी भाषी क्षेत्रों में कॉमर्शियल थिएटर की कमी है और यही इसके विकास में बड़ी बाधा है। जयपुर में नाटकों के दर्शक हैं पर उस अनुपात में कॉमर्शियल थिएटर नहीं हैं।
टीवी चैनलों के रियलिटी शो के बारे में आपकी राय?
रियलिटी शो एकदम ब्लफ हैं। इनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता है। इनमें होने वाले विवाद पूरी तरह बनावटी और बेबुनियाद होते हैं, यह सिर्फ दिखावा है।
और रियलिटी शो में एसएमएस का चलन?
एसएमएस से विजेता तो चुना नहीं जा सकता है, लेकिन ये इसकी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। कभी-कभी इससे गलत निर्णय भी हो जाते हैं, जो बाद में आलोचना का विषय बरते हैं।