पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • आत्म तर्पण बंधन मुक्ति का मार्ग : डॉ. प्रणव पांड्या

आत्म तर्पण बंधन मुक्ति का मार्ग : डॉ. प्रणव पांड्या

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
जयपुर|श्रद्धा सेश्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धापूर्वक किए कार्य को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह श्राद्ध कहलाता है।

यह विचार थे अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. प्रणव पाण्ड्या के। वे शनिवार को जयपुर आए। उन्होंने गायत्री परिवार की ओर से आदिनाथ नगर के गायत्री विला में रखे गए बंधन मुक्ति महोत्सव स्व श्राद्ध के अवसर पर आशीर्वचन दिए। पाण्ड्या ने बताया कि स्व श्राद्ध की अनूठी परंपरा का शुभारंभ इसलिए हुआ है ताकि मनुष्य इस कर्मकांड के माध्यम से जीवन में अपने सभी प्रकार के ऋणों से मुक्त हों। यह आयोजन इस प्रयोजन के लिए भी है कि स्व श्राद्ध के बाद लगभग निष्काम, निरपेक्ष जीवन जी सके। डॉ. पाण्ड्या ने अपने हाथों अपना श्राद्ध करने की वैज्ञानिक महत्ता, श्राद्ध का माहात्मय एवं मुक्ति दर्शन एवं श्राद्ध के रहस्य पर प्रकाश डाला। स्व श्राद्ध का यह कार्यक्रम गायत्री परिवार से जुड़े वीरेंद्र अग्रवाल के निवास पर रखा गया। इसमें वीरेंद्र अग्रवाल के परिजनों की मौजूदगी में शांतिकुंज के संस्कार प्रकोष्ठ के प्रमुख पं. शिवप्रसाद मिश्र, सूरज प्रसाद शुक्ल, उदय मिश्रा ओंकार पाटीदार ने वैदिक विधि विधान से स्व श्राद्ध का कर्मकांड संपन्न करवाया।



गौरतलब है कि अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से यह वर्ष समूह साधना वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। गायत्री परिवार की ओर से श्राद्ध पर्व पखवाड़े में केदारनाथ, जम्मू कश्मीर श्रीनगर में प्राकृतिक आपदा में मृत हुए लोगों की शांति के लिए विशेष कर्मकांड कराया जा रहा है।

गायत्री परिवार ने शहर में पहली बार श्राद्ध कर्मकांड करवाया