(जांच रिपोर्ट में नाम आने के बाद एडीजीपी से की जानी थी पूछताछ, लेकिन जांच अधिकारी से किए गए सवाल।)
जयपुर. नकली घी की कहानी सिर्फ एडीजी जसवंत संपतराम और सरगना दिनेश सिंघल के आपसी संबंधों तक ही सीमित नहीं है। इसके कुछ और भी किरदार हैं। सिंघल की गिरफ्तारी के बाद जब जांच अधिकारी एएसपी हरदयाल सिंह ने आला अफसरों को अपनी रिपोर्ट सौंपी तो कुछ बिंदुओं पर सहमति और असहमति के स्वर उठे। रिपोर्ट में दोषी ठहराए गए एडीजी जसवंत संपतराम से पूछताछ करने के बजाय रिपोर्ट में ही कमियां बताते हुए जांच अधिकारी से एसीबी डीजी के निर्देश पर डीआईजी आलोक वशिष्ठ ने स्पष्टीकरण मांग लिया।
डीआईजी और जांच अधिकारी के बीच नोटिस और उसके जवाब का सिलसिला भी चला। बाद में जांच अिधकारी को ट्रांसफर कर एसीबी से बाहर कर दिया। भास्कर के पास डीआईजी की ओर से लिखे गए दोनों पत्र और जांच अधिकारी की ओर से दिए गए जवाब से संबंधित दस्तावेज सबूत के तौर पर मौजूद हैं।
वो सवाल जिन पर डीआईजी ने नोटिस दिया
> किन गवाहों से पूछताछ की और क्या साक्ष्य हैं? रिपोर्ट में उल्लेख नहीं है।
> ब्यूरो के संबंधित रेंज पर्यवेक्षक कार्यालय को केस डायरियां देरी से भिजवाई।
> दिनेश सिंघल एवं सुभाष गुप्ता को बिना अनुमति क्यों गिरफ्तार किया गया? डीजी ने स्पष्टीकरण चाहा है।
> बातचीत की रिकार्डिंग कैसे हुई और मूल उपकरण में उसे कैसे डाला गया, यह स्पष्ट नहीं है?
> रामावतार खंडेलवाल को गवाह बनाया गया है अथवा संदिग्ध अभियुक्त, यह नहीं बताया गया? फिर भी उसके मकान की तलाशी क्यों ली गई?
> यह स्पष्ट नहीं है कि मुहाना थाने से संबंधित मुकदमे में दिनेश सिंघल एवं रामावतार खंडेलवाल के खिलाफ कितना पुख्ता मामला रह गया था ?
दिनेश सिंघल एवं रामावतार खंडेलवाल के मध्य वार्ता 16 अक्टूबर 2011 को होना माना गया है। इसमें यह बात आई है कि दिनेश सिंघल की ओर से जयपुर पुलिस के एएसपी रैंक के अधिकारी करण शर्मा जो मुहाना प्रकरण के जांच अधिकारी के पर्यवेक्षक थे, को फोन करवाया। आपने इस संबंध में निष्कर्ष दिया है कि उक्त फोन दिनेश सिंघल ने परिचित पुलिस अधिकारी से इसलिए करवाया था कि जांचाधीन मामले में उसे पुलिस परेशान नहीं करें।
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