जयपुर. दस साल पहले अस्पताल में जन्म के समय बदल दी गई रितिका अपने असली माता-पिता के लिए तरस रही है। जबकि उसको पाल रहे दंपती मामले का जल्द निपटारा और बच्चा बदलने के आरोपियों को सजा दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, लेेकिन पिछले नौ साल से अदालतों ने किसी न किसी कारण से इस प्रकरण में स्टे दे रखा है। रितिका अब पांचवीं की छात्रा है और उसको पालने वालों के मन में इसके असली मां-बाप से मिलाने और अपने बच्चे को सीने से लगाने की कसक जरूर है।
यह है मामला : 25 जुलाई 2004 को रात 9 बजे सांगानेरी गेट स्थित महिला चिकित्सालय में मधु जैन की डिलीवरी हुई। बकौल मधु चिकित्सकों ने उसे बताया कि उसके लड़का हुआ है। उसके फुटप्रिंट का दो बार मिलान कराया, लेकिन बाहर परिजनों को लड़की सुपुर्द करते हुए परिजनों से रजिस्टर में हस्ताक्षर भी नहीं कराए गए। प्रसव के बाद तीन घंटे तक उसे लेबर रूम में ही रखा गया।
इस बारे में दूसरे दिन मधु ने अस्पताल प्रशासन को अवगत कराया, लेकिन उन्होंने बगैर हमारा बच्चा दिए ही बच्ची को छीनने की कोशिश की। हमें कागजों में 28 जुलाई को डिस्चार्ज कर दिया गया और जबरदस्ती एक दिन और रोका गया। जैसे-तैसे बच्ची को वहां से हम घर ले आए। एक साल बाद हमने जुलाई 2005 को निचली अदालत (अपर सिविल न्यायाधीश) में बच्चा बदलने व महानगर मजिस्ट्रेट क्रम-33 जयपुर महानगर में फर्जी दस्तावेज संबंधी परिवाद दायर कराया।
सुनवाई के दौरान सामने आया कि नवजात सुपुर्दगी रजिस्टर में फर्जी हस्ताक्षर किए हुए हैं। अदालत में बच्ची के फुटप्रिंट मिलाने से पहले ही चिकित्सकों ने डीएनए जांच करा ली। यह भी सामने आया कि कोर्ट में अस्पताल से दिए फुटप्रिंट और असल में बच्ची के फुटप्रिंट मैच ही नहीं हो रहे हैं। इस बीच, आरोपी चिकित्सकों और अस्पताल कर्मचारियों ने मई-जून 2010 में हाईकोर्ट से स्टे ले लिया। पिछले चार साल से एक के बाद एक न्यायाधीशों ने केस की सुनवाई तो की, लेकिन फैसला नहीं हो सका।
दंपती का दर्द : बच्ची को पालने वाले दंपती का आरोप है कि लड़की के जन्म की जो डीएनए जांच रिपोर्ट अदालत में पेश की गई, वह भी फर्जी है। जबकि कोर्ट ने प्रसंज्ञान में इस दपंती के लड़का होना माना है। अब आरोपी डॉक्टर और कर्मचारी कोर्ट के डर से उन्हें दुबारा डीएनए टेस्ट कराने के लिए दबाव बना रहे हैं। अंतिम सुनवाई के दौरान हमने सभी दस्तावेज पेश कर करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दस्तावेज और मौखिक सुनवाई की जगह लिखित सुनवाई की अर्जी जमा कराई थी।
स्टे खारिज होने का फैसला 18 फरवरी 2011 को सुनाया जाना था, लेकिन कोर्ट में नंबर आने से पहले ही उनको बुलाकर अगली तारीख दे दी गई। फिर उन्होंने 1 अगस्त 2011 व 7 मई 2012 को अदालत से स्टे खारिज करने की गुहार लगाई और 29 सितंबर 2011 को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अंतरिम आदेश रद्द होने बाबत लीगल नोटिस दिया, लेकिन इन सबका अदालत से कोई जवाब नहीं आने तक कानूनी तौर पर परिवादी कोर्ट में उपस्थित नहीं हो सकते। इस वजह से न तो स्टे हट रहा और न ही निचली अदालत में सुनवाई।