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डाउनलोड करेंजयपुर। राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) की जिंदगी रेत की तरह फिसल रही है। दुनिया के उडऩे वाले इस सबसे बड़े पक्षी के रहने के ठिकाने (हैबिटेट) तबाह हो गए हैं। राजस्थान के जिस डेजर्ट नेशनल पार्क में सबसे ज्यादा गोडावण हैं वहां वन विभाग के कब्जे में महज पांच फीसदी जमीन है। ऐसे में सवाल ये है कि यहां राज्य सरकार का 13 करोड़ रुपए की लागत वाला बस्टर्ड रिकवरी प्रोगाम शुरू भी कैसे हो पाएगा?
तीन हजार वर्ग किमी से ज्यादा इलाके में फैले डेजर्ट नेशनल पार्क का नाजुक पारिस्थिकीय तंत्र गड़बड़ा रहा है। विभाग ने चार अगस्त 1980 को जैसलमेर में देश का सबसे बड़ा डेजर्ट नेशनल पार्क तो घोषित कर दिया, लेकिन विभाग के पास यहां सिर्फ पांच फीसदी जमीन है। योजना थी कि विभाग उन स्थानों पर आबादी विस्तार रोकेगा जहां गोडावण और मरुस्थलीय जीवों के निवास स्थल है। मसलन- ब्लैक बक, डेजर्ट फॉक्स, डेजर्ट कैट, रसैल वाइपर और डेजर्ट लिजार्ड। पार्क बने आज 33 साल हो गए हैं लेकिन विभाग का दायरा पांच फीसदी इलाके से आगे नहीं बढ़ पाया है, जबकि मानवीय गतिविधियां और शिकार लगातार जारी है। चिंताएं अब ज्यादा हैं क्योंकि विभाग ने 13 करोड़ की बस्टर्ड रिकवरी योजना बना तो दी है, लेकिन ऐसी स्थिति में वह योजना को अमलीजामा किस इलाके में पहनाएगा।
हमारे यहां खतरे में क्यों हैं गोडावण
राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तानी जिलों में इंदिरा गांधी नहर परियोजना के चलते इलाका सिंचित क्षेत्र में तब्दील हो गया है। इससे गोडावण का पर्यावास (हैबिटेट) स्थल उजड़ गया है। प्रजनन के समय होने वाला डिस्टर्बेंस, शिकार, पेस्टीसाइड व अन्य रसायन भी गोडावण की मौत का कारण बन रहे हैं।
बचाने के लिए क्या?
राजस्थान सरकार ने 14 करोड़ की लागत वाला प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड शुरू किया है। योजना का मकसद सुरक्षित ब्रीडिंग एन्क्लोजर की खोज करना है। पांच करोड़ की पहली किस्त जारी हो चुकी है। टूरिज्म व वाइल्डलाइफ सोसायटी के हर्षवद्र्धन कहते हैं कि बस्टर्ड प्रोजेक्ट आधा-अधूरा है। इसे डेजर्ट नेशनल पार्क के अलावा वहां भी शुरू करना चाहिए जहां गोडावण के हैबिटेट हैं।
क्या हो रहा है देश-दुनिया में
गुजरात में रेडियो टैगिंग: वन विभाग ने कच्छ के नलिया ग्रास लैंड में मानव गतिविधियों पर अप्रैल से अक्टूबर के बीच रोक लगा दी है। यह समय गोडावण का प्रजनन काल होता है।
अबूधाबी में ब्रीडिंग: इंटरनेशनल फंड फॉर हूबारा (बस्टर्ड) कंजर्वेशन ने अब तक हजारों हूबारा बस्टर्ड की ब्रीडिंग की है। चीन गोडावण के लिए एक सेंटर बना रहा है। मोरक्को में 1995 में शुरू होने के बाद से इंटरनेशनल फंड फॉर हूबारा कंजर्वेशन अब तक तकरीबन 50 हजार हूबारा बस्टर्ड की ब्रीडिंग कर चुका है। इनमें से 65 फीसदी तक जीवित बचे रहे।
रेडियो टैगिंग: देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ने गोडावण पर सैटेलाइट से नजर रखने के लिए प्लान बनाया था, वह भी अभी तक सिरे नहीं चढ़ पाया। रेडियो टैगिंग के जरिए गोडावण के क्रियाकलापों से जुड़ी गूढ़ जानकारियां जुटाई जा सकें। मसलन इस पक्षी के प्रजनन, बच्चों, पर्यावास (हैबिटेट), सीजनल मूवमेंट व मौत की जानकारी।
हम सोच ही रहे हैं, ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड ने पुनर्जीवित कर दिया
कैप्टिव ब्रीडिंग: राजस्थान में कैप्टिव ब्रीडिंग प्लान अभी फाइलों में ही बंद जबकि दुनिया ने इस तकनीक के जरिए बस्टर्ड की कई प्रजातियों को लुप्त होने से बचा लिया है। कैप्टिव ब्रीडिंग के जरिए ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और इंग्लैंड ने न केवल विलुप्त बस्टर्ड की प्रजातियों को पुनर्जीवित कर दिया, बल्कि आज वहां इनकी संख्या भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।
प्रोजेक्ट टाइगर की तरह बने बस्टर्ड प्रोजेक्ट
टाइगर को बचाने के लिए जैसे प्रोजेक्ट टाइगर बनाया गया है ठीक उसी तरह ही गोडावण (ग्रेड इंडियन बस्टर्ड) को बचाने के लिए बस्टर्ड प्रोजेक्ट बनना चाहिए। राजस्थान के लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यदि कहीं वे सबसे ज्यादा बचे भी हैं तो वह राजस्थान ही है और यहीं उनके जीवित बचने की संभावनाएं भी ज्यादा हैं।
डॉ. असद रहमानी, डायरेक्टर, बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, मुंबई
कैप्टिव ब्रीडिंग से ही बचेगा गोडावण का अस्तित्व
गोडावण को बचाने के लिए कैप्टिव ब्रीडिंग जरूरी है। ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड ने इसी तकनीक से विलुप्त होते गोडावण को पुनर्जीवित कर दिया है।
आर एन मेहरोत्रा, कंसल्टेंट (वन्यजीव), संयुक्त राष्ट्र संघ
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