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उर्वशी के प्रेमजाल में फंसा एक राजा, मिली ऐसी सजा कि भगवान तक कांप गए / उर्वशी के प्रेमजाल में फंसा एक राजा, मिली ऐसी सजा कि भगवान तक कांप गए

dainikbhaskar.com

Aug 14, 2013, 12:02 AM IST

यह कहानी है एक राजा, एक भगवान और एक अप्सरा की।

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जयपुर। राजधानी से सटे टोंक जिले में स्थित डिग्गी कल्याणजी की कथा बड़ी रोचक है। यह कहानी है एक राजा, एक भगवान और एक अप्सरा की। टोंक जिले के मालपुरा के समीप डिग्गीधाम में श्री कल्याणजी का मंदिर प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक है।
जयपुर से 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित डिग्गी नगर में इस मंदिर का निर्माण मेवाड़ के तत्कालीन राणा संग्राम सिंह के शासन काल में संवत् 1584 (सन् 1527) के ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को तिवाड़ी ब्राहृणों द्वारा हुआ था।
प्रचलित कथानुसार एक समय इंद्र के दरबार में अप्सराएं नृत्य कर रही थीं। उर्वशी नामक अप्सरा नृत्य के दौरान हंस पड़ी तथा इंद्र के कोप का भाजन बनी। इंद्र ने उर्वशी को दरबार की मर्यादा भंग करने के अपराधस्वरूप 12 वर्ष तक मृत्युलोक में रहने की आज्ञा दी। इस आदेशा के बाद उर्वशी मृत्युलोक में आकर सप्त ऋषियों के आश्रम में रहने लगी और बड़ी तन्मयता के साथ ऋषिजनों की सेवा करती रही। उर्वशी की सेवा-साधना से प्रसन्न होकर सप्त ऋषियों ने उससे वरदान मांगने का आग्रह किया। तब उसने अपनी सारी कथा सुनाकर वापस इंद्र के दरबार में जाने की इच्छा प्रकट की।
कैसे अप्सरा पर आया राजा का दिल और मिला श्राप, जानने के लिए आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें...
साभार : पांचजन्य

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सप्त ऋषियों ने उर्वशी से कहा कि "ढूंढार प्रदेश में राजा डिग्व राज्य करते हैं, अत: तुम वहीं जाकर निवास करो, तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।" उर्वशी डिग्व राजा के क्षेत्र में चन्द्रगिरि पहाड़ पर रहने लगी। वर्तमान में यही पहाड़ चांदसेन के डूंगार के नाम से जाना जाता है। 
 
 
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इसी पहाड़ के नीचे राजा डिग्व का सुंदर बाग था तथा उर्वशी रात को घोड़ी का रूप धारण कर बाग में जाकर अपनी उदरपूर्ति करती। इससे त्रस्त होकर राजा डिग्व ने यह आदेश जारी किया कि जिस व्यक्ति के पास से यह घोड़ी निकले, वही उसे पकड़ ले। उस दिन संयोगवश घोड़ी सर्वप्रथम राजा के पास से ही निकली। राजा ने इसका पीछा किया तो घोड़ी ने पर्वत पर जाकर सुंदर रमणी का रूप धारण कर लिया। यही स्थान आज का डिग्गीपुरी है तथा यह पावन प्रतिमा कल्याण जी के नाम से आज असंख्य हिंदुओं का श्रद्धा केंद्र एवं तीर्थ स्थल बनी हुई है।
 
 
 

 

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मानवीय दुर्बलताओं से ग्रस्त राजा डिग्व देवलोक की अप्सरा उर्वशी के मायाजाल में फंस गया। राजा डिग्व ने उर्वशी को राजमहलों की शोभा बढ़ाने का आमंत्रण दिया। उर्वशी ने प्रस्ताव स्वीकारते हुए चेतावनी दी कि उसके दंड की अवधि समाप्त होने के बाद राजा इंद्र उसे लेने आएंगे। तब यदि राजा डिग्व उसकी रक्षा नहीं कर सके तो वह उन्हें शाप दे देगी।
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उर्वशी की अवधि समाप्त होते ही देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु की सहायता से पृथ्वी लोक से राजा डिग्व को पराजित कर दिया। उर्वशी ने राजा डिग्व को कोढ़ी (कुष्टि) होने का शाप दिया। शापानुसार राजा को भयंकर कोढ़ हो गया। उधर, भगवान विष्णु ने इंद्र की सहायता की तो दूसरी ओर डिग्व राजा के कष्ट निवारण का भी उपाय बताया। 
 
 

 

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भगवान विष्णु ने कहा, "कुछ समय बाद उनकी प्रतिमा समुद्र में बहकर आएगी। उसके दर्शन से अभिशप्त राजा का कष्ट निवारण हो जाएगा।" 
 

 

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भगवान विष्णु के कथनानुसार राजा डिग्व समुद्र के किनारे जाकर रहने लगा। कुछ समय पश्चात् राजा की इच्छा पूर्ण हुई। समुद्र में भगवान विष्णु की प्रतिमा बहती हुई आई। 
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उसी समय एक साहूकार भी भारी संकट में था। राजा और व्यापारी ने मिलकर भगवान की प्रतिमा को बाहर निकाला। प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही दोनों के संकट समाप्त हुए।
 
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अब समस्या यह पैदा हुई कि भगवान विष्णु की प्रतिमा को रखने का अधिकारी कौन होगा? तभी आकाशवाणी हुई -  "जो व्यक्ति रथ के अश्वों के स्थान पर स्वयं जुतकर प्रतिमा को ले जा सकेगा, वही इसका उत्तराधिकारी होगा। काफी प्रयासों के बाद भी व्यापारी प्रतिमा को नहीं ले जा सका, परंतु राजा डिग्व इसमें सफल हुए। 
 
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राजा का रथ उस युद्ध स्थल पर जाकर रुक गया, जहां देवराज इंद्र और डिग्व संग्राम हुआ था। इसी स्थान पर राजा डिग्व ने श्री कल्याणराय जी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाकर विधिवत् प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करवा दी। यही स्थान आज का डिग्गीपुरी है तथा यह पावन प्रतिमा कल्याण जी के नाम से आज असंख्य हिंदुओं का श्रद्धा केंद्र एवं तीर्थ स्थल बनी हुई है।
 
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यहां जन-जन के आराध्य देव श्री विष्णु की चतुर्भुज प्रतिमा है, परंतु श्रद्धालुओं की दृष्टि में "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी" के अनुसार भक्त अनेक देवरूपों में इसके दर्शन करते हैं। 
 
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हिंदू भक्तजन इस प्रतिमा में राम, कृष्ण, शिव तथा प्रद्युम्न के रूपों को पाते हैं, तो मुस्लिम इसे "कलंह पीर" के नाम से अभिनंदित कर अपनी लोक आस्था प्रकट करते हैं। मंदिर परिसर में हरिहर पितामह, उमा-महेश्वर, लक्ष्मी नारायण की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
 
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मंदिर में प्रतिदिन भक्तों की भारी भीड़ रहती है, परंतु प्रत्येक माह की पूर्णिमा को यहां मेला लगता है।वर्ष में तीन बड़े मेले यहां लगते हैं। पहला वैशाख पूर्णिमा को सबसे पुराना मेला, दूसरा श्रावण मास की अमावस्या को जिसमें सर्वाधिक भीड़ रहती है तथा तीसरा मेला जल फूलनी एकादशी एवं श्रावण मास की एकादशी को लगता है। 
 
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कई गांव, शहरों से श्री कल्याणजी की पदयात्रा श्रावण मास में डिग्गीधाम जाती है। इसमें लाखों की संख्या में भक्तगण ध्वजा, दंड एवं भजन-कीर्तन करते जाते हैं। लोक आस्था का यह तीर्थस्थल सामाजिक समरसता, सामाजिक एकता एवं लोक संस्कृति के विविध रंगों से मानव समाज को धार्मिक आस्था का संदेश देता आ रहा है।
 
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