जयपुर. अगर उपचुनाव सरकार की लोकप्रियता का थर्मामीटर हैं तो सूरजगढ़ सहित तीनों सीटों पर हुई भाजपा की हार के सबक वाकई में चिंताजनक हैं। ज्यादातर भाजपा नेताओं की जुबान पर शनिवार को यही जुमला था, जब बंद लिफाफों में हार के कारणों को सहेजकर पार्टी नेताओं की तरफ बढ़ाया जा रहा था। सूरजगढ़ की चर्चा सबसे गरम रही, क्योंकि लोकसभा चुनाव नतीजों की तुलना में भाजपा ने जाट लैंड की इस सीट पर महज छह महीने में 75,384 वोट खो दिए हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से 72,114 वोट ज्यादा लिए थे, जबकि उपचुनाव में वह 3270 वोट से हार गई।
भाजपा के नेताओं ने पार्टी नेतृत्व को सौंपी गई अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में उप चुनावों के नतीजों को भविष्य के लिए चेतावनी बताया गया है। खासकर स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनावों को लेकर। नसीराबाद पार्टी के सबसे खराब चुनाव प्रबंधन का उदाहरण रहा तो वैर पार्टी उम्मीदवार के चयन की चूक मानी गई। कोटा उम्मीदवार के चयन, बेहतर चुनाव प्रबंधन और सांसद तथा उम्मीदवार के बीच समन्वय के उदाहरण के तौर पर उभरा। लेकिन भाजपा के ज्यादातर नेताओं को खुली चर्चा के बजाय बंद लिफाफों में कारण सौंपने की यह शैली रास नहीं आई, लेकिन इस पर टिप्पणी करने से ज्यादातर भाजपा नेता बचे।
अलोकप्रियता और फूट के किस्से फिर शुरू, टिप्पणी करने से बच रहे हैं नेता
लोकसभा चुनाव में भाजपा की संतोष अहलावत ने यहां 88,216 वोट लिए, जबकि कांग्रेस की राजबाला ओला महज 16,102 वोट ही ले पाईं। अब उपचुनाव में कांग्रेस के श्रवणकुमार 70,527 वोट हासिल किए। भाजपा के दिगंबरसिंह को 67,257 वोट ही मिले, जो लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले वोटों से 20,959 कम हैं। उम्मीदवार के क्षेत्र को लेकर भी सवाल उठे हैं।
ग्राउंडरिपोर्ट ये : कुछभाजपा नेताओं ने रिपोर्ट में बताया है कि कांग्रेस नेता ब्रिजेंद्र ओला और श्रवणकुमार धुर विरोधी हैं। ओला की पत्नी राजबाला लोकसभा चुनाव में उतरीं तो श्रवणकुमार समर्थकों ने वोट अहलावत को डलवाए। दिगंबरसिंह समर्थकों ने कांग्रेस के लोकसभा चुनाव वाले घटनाक्रम को मौजूदा चुनाव से जोड़कर कुछ नेताओं को कठघरे में खड़ा किया है। इनमें अहलावत भी हैं।
वैर को लेकर तैरते सवाल : लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से 9458 वोटों की बढ़त ली थी, लेकिन कांग्रेस ने उपचुनाव में 25108 वोटों से जीत दर्ज की। यानी भाजपा ले इस क्षेत्र में 34,566 मतदाताओं का समर्थन खो दिया।
ग्राउंड रिपोर्ट ये : उम्मीदवार का चयन गलत। उम्मीदवार की जाति को लेकर भी सवाल। उपचुनाव में हारे कोली से शनिवार को जब मंच नहीं चढ़ा गया तो नेताओं ने भी हैरानी जताई कि आखिर टिकट इतने बुजुर्ग को क्यों दिया गया।
नसीराबाद की लापरवाही : महज 386 वोटों से भाजपा के हाथ से फिसली इस सीट का चुनाव प्रबंधन ठीक होता तो भाजपा की हार नहीं होती। सांसद और प्रत्याशी के बीच समन्वय के अभाव की भी चर्चा रही। कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव की तुलना में यहां 5,158 वोट ज्यादा जोड़े तो भाजपा ने 12,765 वोट खो दिए।
ग्राउंड रिपोर्ट ये : विधायक से सांसद बने सांवर लाल जाट को मंत्रिपद खोने का मलाल है। वे वैसी मेहनत नहीं कर पाए, जैसी लोकसभा और विधानसभा में कर सके थे। किसान वर्ग ने वोट देने में वैसा उत्साह नहीं दिखाया, जैसा लोकसभा में दिखाया था।