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विभागों के पास सरकार का‌‌ 5000 करोड़ बकाया, अब वसूली की तैयारी

7 वर्ष पहले
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जयपुर. साल 2014 तक पानी, बिजली, सड़क, परिवहन, पर्यटन, शिक्षा तथा चिकित्सा समेत करीब 40 योजनाओं में सरकार ने विभागों को 5 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का उधार दे रखा है। अब अपनी वित्तीय सेहत सुधारने के लिए सरकार ने विभागों से कर्ज वसूली की तैयारियां शुरू कर दी हैं।
इसके लिए वित्त विभाग की इन सभी विभागों के साथ शुक्रवार को बैठक होनी थी, जो नहीं हुई। जानकारी के मुताबिक दिसंबर में ही इस मामले में बैठक की जाएगी। उधार की रकम वसूलने को लेकर सरकार के इस कदम को काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे पहले कभी कर्ज की वूसली के लिए इस तरह के प्रयास नहीं किए गए। मौजूदा बजट में सरकार ने इन विभागों को अनुदान और सब्सिडी के अलावा करीब 370 करोड़ रुपए का उधार स्वीकृत किया है।
क्यों जरूरी है कर्ज की वसूली
मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने बजट भाषण में इसका विशेष रूप से जिक्र करते हुए कहा था कि राज्य सरकार के ऊपर कर्ज का पहाड़ खड़ा हो गया है। मौजूदा वित्त वर्ष में राज्य का कुल कर्ज 1 लाख 30 हजार करोड़ रुपए अनुमानित है और कुल बजट से भी ज्यादा है।
विभागों को लिखा पत्र
वित्त विभाग की ओर से कर्ज वसूली को लेकर इन सभी महकमों को पत्र लिखा गया है। इसमें विभागों से पूछा गया है कि कर्ज की रिकवरी के लिए उनकी क्या योजना है। इसके अलावा उनके खातों की वर्तमान स्थिति की विस्तृत जानकारी मांगी गई है। विभागों से पूछा गया है कि मौजूदा समय में उनके ऋण की स्थिति क्या है। उन्हें इसके पेटे कितना ब्याज देना पड़ रहा है और आय के उनके संसाधन क्या हैं।
बिजली कंपनियों पर सबसे ज्यादा कर्ज
सरकार की ओर से विभागों को दिए गए कुल कर्ज से आधे से ज्यादा बिजली कंपनियों के पास है। बिजली परियोजनाओं के नाम पर सरकार ने बिजली कंपनियों को 3 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज दे रखा है। वहीं आवास और शहरी विकास के लिए 900 करोड़ रुपए का दिया हुआ है। इसके अलावा विमानन सेवाओं को 147 करोड़ रुपए, सरकारी कर्मचारियों को 1.8 करोड़ रुपए, शिक्षा एवं खेलकूद पर 4.5 करोड़ रुपए, फसल और कृषि कार्यों के लिए 130 करोड़ रुपए, जलापूर्ति तथा सफाई के लिए 37 करोड़ का कर्ज बकाया है।
खर्चों में कटौती का दबाव

कर्ज की रकम चुकाने के लिए विभागों का अपने खर्चों में कटौती का भी दबाव रहेगा क्योंकि इनमें से कई विभाग ऐसे हैं जिनके पास अपनी आय के स्रोत बेहद सीमित हैं। ऐसे में कर्ज की रकम चुकाने के लिए उन्हें अपने प्रशासनिक खर्च में कमी करनी होगी।