रणथंभौर टाइगर रिजर्व क्षेत्र में लाखेरी-इंद्रगढ़ के 409 वन हेक्टेयर में खनन का मामला : संबंधित फर्म का खनन रिन्यूवल के लिए नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड से भी मंजूर हो गया, लेकिन बफर एरिया को लेकर आंख मूंदे रहे, अब मामला खुला तो गुपचुप वर्क-परमिट जारी करने का दबाव, संबंधित वनाधिकारियों ने हाथ खड़े किए तो महीनेभर से बैठकें...
जयपुर. रणथंभौर टाइगर रिजर्व के पास जिस माइनिंग एरिया में बाघों के मूवमेंट को देखते हुए वन विभाग ने ढाई साल पहले ही ‘बफर एरिया’ घोषित कर दिया, वहां न केवल माइनिंग होती रही, बल्कि अब उस एरिया में खनन कार्य करने की छूट देने का दबाव बनाया जा रहा है। मामला लाखेरी-इंद्रगढ़ वनक्षेत्र के 409.88 हेक्टेयर (208 तो पुराना, जिसका रिनुवल होना है और 200 नया फॉरेस्ट जो डायवर्जन के लिए मांगा है) में माइनिंग का है। यहां एसीसी कंपनी के पास 13 जुलाई, 2013 तक माइनिंग की स्वीकृति थी। इसी बीच वन विभाग ने जुलाई 2012 में बाघों के मूवमेंट को देखते हुए इसे बफर क्षेत्र घोषित कर दिया।
इसके बावजूद यहां माइनिंग होती रही। अब जब फर्म ने माइनिंग लीज अवधि बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को लिखा तो बफर एरिया में चलती आ रही अवैध माइनिंग को लेकर हड़कंप मचा। मामला सीएमओ से वन विभाग के सचिव के पास पहुंचा। अब सवाल यह है कि बफर जोन में अव्वल तो माइनिंग क्यों होती रही। दूसरा अहम सवाल करोड़ों रुपए की लीज का है, जो बकाया है। संबंधित फर्म माइनिंग रिनुवल और सरकार के कई आला अफसर खनन के लिए वन विभाग के अफसरों पर वर्क-परमिट जारी करने का दबाव बना रहे हैं।
फर्म ने ही खनन की अवधि बढ़ाने को कहा तो बफर जोन में अवैध माइनिंग का खुलासा हुआ
यही नहीं संबंधित फर्म ने केंद्र सरकार को 10 अक्टूबर, 2014 को पत्र लिखकर मौजूदा वन और बफर जोन में खनन कार्य के लिए एक साल की अवधि बढ़ाने की मांग की है। जबकि संबंधित एरिया को बफर जोन घोषित करने के बाद मुख्य वन संरक्षक कोटा की ओर से 24 दिसंबर, 2013 (पत्र क्रमांक 12353) व उप वन संरक्षक बूंदी ने 4 फरवरी 2014 (पत्र क्रमांक 932) को संबंधित फर्म (एसीसी लि.) को पत्र लिखकर वन्यजीव (सुरक्षा) अधिनियम 1972 एवं वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत किसी भी तरह के खनन कार्य नहीं करने के लिए पाबंद किया था।
वन विभाग की ओर से सरकार को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि फर्म के पत्र से ही प्रतीत होता है कि उन्होंने वन क्षेत्र में निरंतर खनन कार्य किया है, जबकि खनन लीज का दूसरा नवीनीकरण भी 31 जुलाई, 2013 को ही समाप्त हो गया था।
सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद ही मिल सकती है छूट
बैठकों के दौरान सरकार ने एसीसी लि. को खनन के लिए ऑफिशियल वर्क-परमिट जारी करने को कहा है। हालांकि नियमों के खिलाफ बताते हुए विभाग के अफसरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। उनका कहना है कि अंतिम स्वीकृति सुप्रीम कोर्ट देगा। अफसरों ने लिखा है कि बफर एरिया घोषित होने की तिथि जुलाई 2012 के बाद ही संबंधित एरिया में खनन बंद हो जाना चाहिए था, जो करीब दो साल तक चलता रहा।
खनन एरिया और नेशनल पार्क का एकमात्र रास्ता
जिस एरिया में माइनिंग को लेकर बवाल मचा है वह एरिया रामगढ़ विषधारी अभयारण्य क्षेत्र को रणथंभौर टाइगर रिजर्व से जोड़ने का एकमात्र कॉरिडोर है। पिछले दो साल में इस रूट से दो-तीन बाघों के रामगढ़ विषधारी में पहुंचने का रिकॉर्ड भी वन विभाग और वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड संस्था के पास मौजूद हैं।
छिपा रहे हैं अब अपनी गलती
हमारी कंपनी 100 साल से उस एरिया में लीगल खनन कर रही थी, लेकिन वन विभाग ने टेबल वर्क के चलते उस एरिया को वाइल्ड लाइफ के बफर जोन में डाल दिया। अब सरकार की इस गलती की सजा हम क्यों भुगतें? हम तो लीज अमाउंट भी देने के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकार यह राशि भी नहीं बता रही। अब अपनी गलती छिपाने के लिए हमको स्वीकृति जारी नहीं कर रहे। -हरेंद्र सिंह, एसीसी लिमिटेड के कॉर्पोरेट
अफेयर संबंधी ऑफिसर, सरकार देख रही है मामला
संबंधित एरिया में कई साल से माइनिंग हो रही थी। इस बीच उसे बफर में शामिल कर लिया। संबंधित अफसरों ने इसकी जानकारी नहीं दी। अब मामला राज्य सरकार से केंद्र सरकार को भेजा गया है। माइनिंग का क्या होगा? यह मामला सरकार देख रही है। -एसएन सिंह, चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन