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'शर्मनाक है स्कूलों में टॉयलेट न होना'

9 वर्ष पहले
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जयपुर.स्कूलों में बेटियों के लिए टॉयलेट नहीं होने के मुद्दे पर प्रसंज्ञान लेते हुए राज्य मानवाधिकार आयोग ने इसे प्रदेश के लिए शर्मनाक बताया है। आयोग ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि एक लोक कल्याणकारी राज्य एवं सभ्य कहलाने वाले समाज के लिए यह बहुत ही दुखद, सोचनीय और बेशर्मीपूर्ण बदनुमा दाग कहा जाए तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। आयोग ने कहा कि लोकसेवक बेशर्मी से आंख मूंदकर बैठे रहते हैं जो समाज के लिए दुखद स्थिति है।
दैनिक भास्कर राजकीय स्कूलों में टॉयलेट नहीं होने की स्थिति को प्रमुखता से लगातार प्रकाशित कर रहा है। आयोग ने ‘स्कूलों में टॉयलेट नहीं, बेटियां छोड़ रही हैं पढ़ाई’ शीर्षक से छपी खबर का हवाला देते हुए कहा कि हमारा देश नारी सम्मान में विश्वपटल पर अग्रणी श्रेणी में माना जाता रहा है। इसके विपरीत हमारी सरकार इस समस्या को जानते हुए भी कोई कारगर व्यवस्था करने में अपनी लाचारी जता रही है।
आयोग ने शिक्षा विभाग से इस मामले में रिपोर्ट भी मांगी है। आयोग ने यह भी कहा कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री खुद इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि अत्यावश्यक सुविधा में शामिल टॉयलेट की व्यवस्था नहीं होने से बेटियों को बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर होना पड़ता है।
भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट : दर्द ऐसा कि बयां करना भी मुश्किल
भास्कर ने कई स्कूलों की हकीकत परखी तो बेटियों के साथ ही महिला शिक्षकों ने भी टॉयलेट को लेकर अपनी पीड़ा जताई। दर्द ऐसा कि उनके लिए ठीक से बयां करना भी मुश्किल रहा। उनका कहना था कि सात घंटे के बाद छुट्टी होने पर घर लौटकर ही टॉयलेट जाती हैं। संस्थान प्रधान भी स्वीकार तो करते हैं लेकिन वे भी अपनी मजबूरी जता देते हैं।
केस-1 : बेटियों के लिए प्रताड़ना से कम नहीं
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बक्सावाला (जयपुर) में पढ़ाने वाली भावना शर्मा का कहना है स्कूल में इंतजाम नहीं होने के कारण वे घर लौटने तक बेहद मुश्किल में रहती हैं। छोटी बच्चियां तो बाहर ही यहां-वहां निवृत्त हो जाती हैं, लेकिन ऊंची कक्षाओं की बेटियों के लिए यह किसी प्रताड़ना से कम नहीं है। शिक्षिका कल्पना यादव ने बताया कि नाम के लिए एक टॉयलेट है, लेकिन इतना बुरा हाल है कि अरसे से ताला ही लगा है।
केस-2 : शर्म आती है पर क्या करें!
प्राथमिक स्कूल टीबा की ढाणी (जयपुर) की शिक्षिका चंद्रकांता का कहना है मजबूरी में शर्म को भी छोड़ना पड़ता है। बच्चियां छोटी हैं, लेकिन बेहद सकुचाते हुए उन्हें अपना समय काटना पड़ता है। कई जगह चारदीवारी नहीं होने के कारण टॉयलेट होने न होने का अर्थ नहीं रह गया। बाहर से लोगों की ताक-झांक का भी अलग से भय रहता है।