जयपुर। एडवरटाइजिंग जगत में कॉपी राइटर, स्क्रीन राइटर और फिर गीतकार। एक साथ अनेक प्रतिभाओं के धनी प्रसून जोशी ने गार्गी मिश्रा से एक बातचीत में साझा किया कि कैसे अलमोड़ा के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले मध्य वर्गीय परिवार के लड़के ने खुद को एडवरटाइजिंग जगत के सरताज से ले कर फिल्मों में बतौर ऑन डिमांड गीतकार के रूप में स्थापित किया।
आपका बचपन कहां और कैसे बीता? बड़े हो कर क्या बनने का सपना देखते थे ?
मेरा जन्म अलमोड़ा में 16 सितम्बर 1971 में हुआ और अधिकतर वक्त पहाड़ों में बीता जहां प्रकृति और किताबों के अलावा मनोरंजन के बहुत साधन नहीं हुआ करते थे। मेरे मां और पिता शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत थे। ऐसे परिवेश में मेरा रुझान कविताओं और किताबों के प्रति होना स्वाभाविक था। पिता मुझे एक आईएएस के रूप में देखना चाहते थे। उनके सपनों को मान देते हुए ग्रेजुएशन के बाद मैंने सिविल सर्विसेज की परीक्षा तो दी लेकिन तब भी मेरे अंदर का कवि जीवित रहा।
कविताओं में जीवन का अर्थ ढूंढने वाले नौजवान ने एमबीए करने के बारे में क्यों सोचा? विज्ञापन जगत से गीत लेखन की तरफ रुझान कैसे हुआ?
मुझे इस बात की चिंता हमेशा सताती थी कि मेरे अंदर की क्रिएटिविटी को सही दिशा नहीं मिली तो क्या होगा? इस उलझन के साथ मैंने एमबीए की पढ़ाई पूरी की और ऐसे कॅरिअर का चुनाव किया जहां मेरी क्रिएटिविटी बनी रहे और मैं अपनी जीविका भी अर्जित कर सकूं। मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि जिस तासीर का मैं आदमी था उसी तासीर का मैं कॅरिअर चुन सका। मैंने एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री में अपना हाथ आजमाया और सफल भी रहा। इस दौरान वक्त आया इंडी पॉप का और मेरी मुलाकात सेमी क्लासिकल सिंगर शुभा मुद्गल से हुई। उन्होंने मेरी कविताएं पढ़ीं जो उन्हें बेहद पसंद आईं । इसके बाद ही ‘अब के सावन’ नाम का एल्बम लांच हुआ जिससे मुझे पहला ब्रेक मिला।
विज्ञापन जगत के दिग्गजों का मानना है कि वे कुछ सेकंड में एक फीचर फिल्म जैसा प्रभाव पैदा कर देते हैं। आप इसे आत्मविश्वास कहेंगे या घमंड?
बेशक मैं इसे आत्मविश्वास ही मानता हूं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, ठंडा मतलब कोकाकोला जैसा विज्ञापन। इस विज्ञापन ने एक बहुत बड़े मास से खुद को जोड़ा और उपभोक्ताओं के दिमाग में एक ब्रांड को स्थापित किया। विज्ञापनों का काम ही गागर में सागर जैसे प्रभाव को पैदा करना है।
कई मशहूर स्क्रिप्ट राइटर्स और गीतकार आगे चल कर फिल्म मेकिंग की तरफ बढ़ गए। क्या आप भी कुछ ऐसे प्रयोगों की तैयारी कर रहे हैं?
फिल्म मेकिंग ऐसा पेशा है जिसमें लेखन, ट्रैवल, संगीत, कोरियोग्राफी, प्रमोशन सब कुछ मिला जुला है। आगे चल कर अगर मुझे ऐसा लगा कि मेरे लिखे हुए के साथ न्याय नहीं हो रहा है तो मैं खुद को बतौर डायरेक्टर देखना चाहूंगा। मेरे लिए मुख्य उद्देश्य अपनी बात को लोगों तक पहुंचाना है, चाहे वो कोई भी माध्यम हो।