जयपुर। उदयपुर में जन्मे उस्ताद फरीदुद्दीन डागर का जयपुर से भी गहरा नाता था। वो डागर घराने के अन्य कलाकारों की तरह ही फकीरी प्रकृति के कलाकार थे। मन में आया तो चार लड्डुओं में रात भर गा दिया, नहीं तो लाख रुपए भी ठुकरा दिए। जयपुर में मोहर्रम के मौके पर लगभग हर साल आना होता था।
वो अपने घराने के कलाकारों के साथ रामगंज की घोड़ा निकास रोड स्थित बाबा बहराम खां की चौखट पर रहकर मोहर्रम के नियम कायदों का निर्वहन किया करते थे। प्रचार-प्रसार की मरीचिका से दूर इस कलाकार को सरकार द्वारा की गई खुद की उपेक्षा का दुख हमेशा सालता था।
सरकारी रवैये से दुखी होकर उन्होंने 2012 में मिला पद्मश्री सम्मान भी ठुकरा दिया। दरअसल सरकार ने उनके साथ उनके शिष्यों गुंदेचा बंधुओं को भी पद्मश्री देने की घोषणा कर डाली। संगीत के नियम-कायदों और परंपराओं में बंधे डागर ने यह सम्मान नहीं लिया। जयपुर की सुनीता अमीन ने भी उनसे ध्रुवपद गायन की गहन शिक्षा ली और वो अपनी इसी शिष्या के साथ मिलकर यहां खो नागोरियान में ध्रुवपद पीठ की स्थापना में लगे हुए थे।
उन्होंने इसकी पिछले दिनों विधिवत घोषणा भी की थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जयपुर ध्रुवपद के इस योगी की साधना का केंद्र बनने से तो रह गया, लेकिन उनकी कला और उनके द्वारा स्थापित की गई परंपराओं का यह शहर हमेशा गवाह रहेगा।
कलाकारों ने किया शोक व्यक्त
उनके निधन पर उस्ताद सइदुद्दीन डागर, वासिफुद्दीन डागर, बहाउद्दीन डागर, पं.लक्ष्मण भट्ट तैलंग, पं.विश्वमोहन भट्ट, डॉ.मधु भट्ट तैलंग, प्रो.सुमन यादव सहित अनेक कलाकारों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। साथ ही उन्हें नादब्रrा की गायकी के ऐसे साधक की संज्ञा दी जिसने मूल्यों और परंपराओं से कभी समझौता नहीं किया।