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धनुष खरीदने के लिए मां ने गिरवी रखी थीं चूड़ियां, बेटे ने देश को दिलाया गोल्ड

7 वर्ष पहले
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(17वें एशियन गेम्स में पदक जीतने वाले गोल्डन ब्वॉय रजत।)
जयपुर. तीन साल पहले धनुष खरीदने के लिए मेरी मां ने अपनी सोने की चूड़ियां (कंगन) गिरवी रख दी थीं, तब ही मैंने तय कर लिया था कि एक दिन ऐसा कमाल करूंगा कि मेरी मां गर्व से अपना सिर ऊपर उठाएंगी। पढ़ाई में मैं भले ही पिछड़ गया, लेकिन तीरों के निशाने नहीं भटके। सटीक निशाने लगाने के प्रयास में मैं 12वीं में लगातार तीन बार फेल हो गया, लेकिन आज एशियन गेम्स में पहली ही परीक्षा देकर मैरिट में पहला स्थान हासिल कर लिया। यह कहना है तीरंदाजी में इतिहास रचने वाले गुलाबी नगर के युवा तीरंदाज रजत चौहान का।
17वें एशियन गेम्स में पदक जीतने के बाद इंचियोन से भास्कर से टेलीफोन पर विशेष बातचीत में रजत ने कहा कि मैंने पिछले तीन साल लगातार 12वीं की परीक्षा का फॉर्म भरा, लेकिन जब भी परीक्षा होती, मेरा टूर्नामेंट आ जाता। दो बार तो मैं परीक्षा ही नहीं दे पाया। इस कारण तीनों ही बार फेल हो गया। इस बार भी 12वीं क्लास में बैठ रहा हूं। मुझे इसका अफसोस नहीं, क्योंकि मैंने मेरे खेल की असली परीक्षा में मैरिट में पहला स्थान (स्वर्ण पदक) हासिल कर लिया है।
खुशी से छलक पड़े मां के आंसू
सांगानेर में सिंधी सागर कुएं के सामने नगर निगम कार्यालय रोड पर स्थित रजत के घर में शनिवार सुबह ही घर के सभी सदस्य टीवी पर नजर गड़ाए हुए थे। भारतीय टीम ने जैसे ही स्वर्ण पदक जीता, सभी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मां निर्मला देवी के आंखों में तो खुशी से आंसू छलक पड़े। बाद में गली में पटाखे फोड़े गए और मिठाइयां बांटी गईं। जैसे ही रजत के पदक जीतने की खबर फैली रिश्तेदारों व परिचितों का जमावड़ा वहां लग गया।
मीडिया को हुजूम भी वहां इकट्‌ठा हो गया। रजत की मां निर्मला देवी व वकील पिता ताराचंद चौहान पूरे दिन इंटरव्यू देने में व्यस्त रहे। खेल परिषद के पदाधिकारियों ने भी रजत के घर जाकर उनके परिजनों को बधाई दी। निर्मला देवी ने बताया कि मेरे बेटे ने आज हमारा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। मैंने उसकी सफलता के लिए मन्नत मांगी थी, जो पूरी हो गई। अब बस रजत के घर आने का इंतजार है।
रोज देखते थे भारत की पदक तालिका
रजत ने कहा कि हम रोज भारत की पदक तालिका देखते थे, लेकिन शुरुआती दिन के अलावा उसमें स्वर्ण पदक नहीं जुड़ रहा था। हम तीनों तीरंदाजों ने तय कर लिया था कि अब इस सूची में हमें स्वर्ण पदक जोड़ना है। हम स्वर्ण जीतने के लिए पूरी तरह आश्वस्त थे।
अमेरिका में की थी तैयारी : रजत ने बताया कि एशियन गेम्स में लिए हमने यूएसए में 10 दिन की विशेष ट्रेनिंग की थी। इंचियोन में भी हम 15 दिन पहले ही आ गए थे, ताकि यहां की परिस्थितियों से वाकिफ हो जाए। रजत ने अपनी सफलता के लिए अपने पहले कोच कमलेश शर्मा और धनेश्वर मईड़ा को श्रेय दिया। उन्होंने तीन साल तक खेल परिषद की एकेडमी में ट्रेनिंग ली थी।
सरकार से नौकरी की उम्मीद
भारतीय टीम में शामिल तीनों ही तीरंदाज अलग-अलग राज्य के हैं और तीनों का बैकग्राउंड भी अलग है। दिल्ली के अभिषेक आयकर विभाग में कार्यरत हैं, तो हरियाणा में जन्मे संदीप कुमार सेना में हैं। रजत ने कहा कि हम अलग-अलग राज्य से हैं, लेकिन आपसी समझ बहुत अच्छी है। रही नौकरी की बात, तो मैं चाहता हूं कि मेरी नौकरी राजस्थान में ही हो, ताकि मैं यहां से खेलता रहूं और भविष्य में उभरते खिलाड़ियों को ट्रेनिंग भी दूं।
जो मैं नहीं कर पाया, वह रजत ने कर दिखाया: तीरंदाजी कोच लिंबाराम
मैं तीन बार ओलिंपिक में खेला। एशियाड में भी पदक से चूक गया। तीरंदाजी में जो मैं नहीं कर पाया, वह रजत ने कर दिखाया। अमूमन अपने राज्य में तीरंदाजी को आदिवासी इलाके का खेल माना जाता था, लेकिन रजत ने इसको गलत साबित कर दिया। वे राजधानी जयपुर में पैदा हुए, यहां पर ही एसएमएस स्टेडियम पर तीरंदाजी सीखी और आज एशियाड में डंका बजा दिया।
...तो बन जाए कई रजत: लिंबाराम ने भास्‍कर को बताया कि अब शहरी क्षेत्रों से भी इस खेले की काफी प्रतिभाएं आगे आ रही है, जरूरत बस उनको तराशने की है। यह जगतपुरा में तीरंदाजी एकेडमी पांच साल पहले शुरू हो जाती, तो आज रजत जैसे कई सितारे राज्य का नाम रोशन कर रहे होते। सरकार को चाहिए कि वहां पर जल्दी से एकेडमी शुरू करे।
आगे की स्लाइड्स में देखें घर पर मना जश्न और मां के आखों से छलके खुशी के आंसू...