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असमानताएं खत्म हों, अस्पतालों पर ध्यान दे सरकार, एएनएम के आधे पद खाली

7 वर्ष पहले
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जयपुर. प्रसव से बड़ी पीड़ा ये लेबर रूम ग्राउंड रिपोर्ट भास्कर में छपने के बाद राज्य सरकार उन उपायों को तलाशने में लगी है जिनसे मां और बच्चे लेबर रूम से सुरक्षित वापस आ सकें। भास्कर ने चिकित्सा के क्षेत्र में काम कर रहे विशेषज्ञों से बात कर उन्हीं उपायों की पड़ताल की है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हमें स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने के लिए आमूल-चूल बदलाव भी करने पड़ सकते हैं। इसके लिए राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छा-शक्ति की सख्त जरूरत है।
समस्या कहीं वार्डों में सन्नाटा तो कहीं एक बिस्तर पर दो प्रसूताएं
प्रदेश में सभी सीएचसी समान तौर पर लोगों के लिए सुविधा मुहैया नहीं करवा पा रहे। मसलन बिचून, सांभर लेक, कालाडेरा, दूदू और बगरू जैसे सीएचसी पर प्रसव कराने वाली महिलाओं की तादाद उंगलियों पर गिनने लायक है जबकि चौमूं और फुलेरा जैसे अस्पतालों के जननी वार्डों में पैर रखने की जगह तक नहीं रहती। यहां हर माह 300 तक प्रसव होते हैं। हालात ये हैं कि यहां एक-एक बिस्तर पर दो-दो प्रसूताओं को घंटों प्रसव पीड़ा सहते हुए अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।
समाधान प्रयास संस्था से जुड़े डॉ. नरेन्द्र गुप्ता के मुताबिक जिन सीएचसी व अन्य सरकारी अस्पतालों में अन्य के मुकाबले ज्यादा भार है वहां विशेष व्यवस्थाएं की जा सकती हैं। वहीं, आसपास के पीएचसी व उप-स्वास्थ्य केंद्रों पर भी सुविधाओं में बढ़ोतरी कर सीएचसी का भार कम किया जा सकता है। यहां महीने में 60 से ज्यादा डिलीवरी होने का मतलब अव्यवस्था होना है।
एएनएम के आधे पद खाली
ग्रामीण इलाकों में मां-शिशु और अस्पताल के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का काम करने वाली महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता (एएनएम) के भी आधे पद खाली पड़े हैं।
समस्या सर्जन हैं पर सर्जरी नहीं
भास्कर ने ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान जिन सीएचसी का दौरा किया उनमें दूदू, फुलेरा, फागी, चौमूं जैसे सीएचसी पर सर्जन और ऑपरेशन थिएटर तो हैं लेकिन एनेस्थीसिया स्पेशलिस्ट नहीं हैं। ऐसे ही हालात प्रदेश के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों (सीएचसी) के हैं। ऐसे में सीजेरियन प्रसव नहीं हो पा रहे। समाधान एनेस्थीसिया विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहे अस्पतालों में ऑपरेशन नहीं हो पा रहे। इसके लिए विशेषज्ञों की भर्ती की जाए व कुछ पैरा-मेडिकल स्टाफ को भी एनेस्थीसिया (निश्चेतना) की गहन ट्रेनिंग दी जा सकती है।
मातृ-शिशु मौतें ज्यादा, अलग से योजना बने
डॉ. अशोक पनगडिय़ा के मुताबिक ऐसे जिले पहले से ही चिन्हित हैं जहां मातृ-मृत्यु अनुपात (एमएमआर) और शिशु-मृत्यु दर ज्यादा है। यानी यहां हाई रिस्क प्रेगनेंसी ज्यादा हैं। इन जिलों में सरकार को ज्यादा डॉक्टर व पैरा-मेडिकल स्टाफ की जरूरत है। वहीं, इन अत्यंत पिछड़े इलाकों में डॉक्टरों व अन्य स्टाफ के लिए सुविधाओं में बढ़ोतरी की जाए।
प्राइमरी और सैकंडरी अस्पतालों पर ध्यान दे सरकार
हमारी चिकित्सा व्यवस्था के तीन सेक्टर हैं- प्राइमरी, सैकंडरी और टरशरी। टरशरी सेक्टर में योजनाओं की भरमार है और प्राथमिक और सैकंडरी स्तर का परफॉर्मेंस अच्छा नहीं होने से इस पर भार बढ़ गया है। हमें बड़े अस्पतालों की भीड़ को कम करना होगा तभी वहां स्पेशिएलिटी सेवाओं का विस्तार हो सकता है। जयपुर में सेटेलाइट और मेडिकल कॉलेज से संबद्ध कई अस्पताल सिर्फ आउटडोर ही संभाल पा रहे हैं।
ट्रैकिंग सिस्टम को मजबूत करना होगा
विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार की ओर से मां और बच्चे की ट्रैकिंग के लिए बने प्रेगनेंसी, चाइल्ड ट्रैकिंग एंड हैल्थ सर्विसेज मैनेजमेंट सिस्टम (पीसीटीएस) को और आधुनिक बनाए जाने की जरूरत है ताकि हाई-रिस्क प्रेगनेंसी को पहचान कर सही वक्त पर महिला को सही अस्पताल में पहुंचाया जा सके।