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राजस्थान की भावनाओं को रस्म अदायगी मत समझिए

9 वर्ष पहले
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राज्य विधानसभा और उसका सदन, ईंट-गारे और सीमेंट से बना भवन नहीं, बल्कि 6.5 करोड़ राजस्थानियों की भावनाओं का जीता जागता प्रतीक है। रहेगा भी। होना तो यह चाहिए कि सरकार का लिखा हुआ भाषण पढ़ने की बजाय राज्यपाल उसमें अपने पद और गरिमा की मौलिकता पिरोये। लेकिन यहां तो चार पैरे पढ़ने के बाद अभिभाषण को पढ़ा हुआ मानने का आदेश देकर राज्यपाल सदन से चली जाती हैं। गुरुवार को राजस्थान विधानसभा में यही हुआ।
हैरत की बात यह है कि पक्ष और खासकर विपक्ष के एक भी विधायक ने सवाल तक नहीं उठाया कि आखिर करोड़ों राजस्थानियों के साथ इस तरह भावनात्मक मजाक क्यों किया जा रहा है?
सही है अभिभाषण में रुचि कम हो रही है। लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? अगर अभिभाषण में मौलिकता बची होती, और राज्यपाल खुद इस बचाव कार्य में लगे रहते तो लोगों की भावनाएं इस तरह रस्म अदायगी की भेंट नहीं चढ़तीं।
सवाल यह नहीं है कि राज्यपाल ने आखिर ऐसा क्यों किया? बड़ा सवाल यह है कि लोगों की समस्याएं हल करने वाली इस विधानसभा में कल को आएगा कौन? अभिभाषण में विधायकों की दिलचस्पी नहीं ही रहती। लेकिन आज यह भी समझ में आ गया कि खुद राज्यपाल की भी इसे पढ़ने में कोई रुचि नहीं होती। सत्ता पक्ष की खामोशी समझ में आती है, पर विपक्ष का मौन भी कुछ कहता है।
कहीं ऐसा न हो कि अगली बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके ही अभिभाषण के कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली जाए और हम घर बैठे मेजें थपथपाने के अलावा कुछ नहीं कर पाएं।
लोकतंत्र में अभिभाषण को पढ़ा हुआ मान लिए जाने का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। कल अभिभाषण पर बिना बहस के ही बहस हो गई मान लिया जाएगा। क्या हम इसे भी स्वीकार कर लेंगे? इस पर बहस तो होनी ही चाहिए कि पढ़े हुए मान लिए जाने का मतलब क्या है? क्या यह होना चाहिए या नए सिरे से इस पर चर्चा होनी चाहिए-क्यों पढ़ा हुआ मान लिया जाए।