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14 हजार करोड़ खर्च टॉयलेट फिर भी नहीं

9 वर्ष पहले
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जयपुर.शिक्षा पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद स्कूलों में टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधा सभी को नहीं मिल सकी है ।
वर्ष 2008-09 में 7709 करोड़ रु. का बजट अब दुगुना होकर 14 हजार करोड़ से ज्यादा का हो गया, लेकिन सुविधाओं की कमी जस की तस है। और तो और केंद्रीय योजनाओं के तहत भी प्रदेश को तकरीबन 250 करोड़ का सालाना अनुदान मिलता है। इतने के बावजूद आज भी हजारों स्कूलों में टॉयलेट और पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है।
शिक्षाविदों का कहना है कि जब तक स्कूलों में आधारभूत सुविधाएं नहीं होंगी, पढ़ाई का माहौल नहीं बन पाएगा। सर्व शिक्षा अभियान जैसी महत्वाकांक्षी योजना के लिए यह स्थिति खतरनाक है।
2,117 स्कूल बिना भवनों के चल रहे हैं
राज्य में सरकारी स्कूलों की दुर्दशा का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर के 2117 स्कूल बिना बिल्डिंग के ही चल रहे हैं। करीब 6200 ऐसे स्कूल हैं जिनमें पीने के पानी का इंतजाम नहीं है। इसके अलावा 9160 स्कूलों में क्लास रूम नहीं हैं।
पांच साल में तिगुना हुआ बजट, लेकिन पीने को पानी भी नहीं मिलता
राज्य में शिक्षा का बजट पिछले पांच साल में तिगुना हो गया है। मौजूदा सत्र में यह राशि 2567 करोड़ रुपए है। बावजूद इसके शौचालय, पेयजल व अन्य मूलभूत सुविधाएं नदारद हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य प्रो. वी.एस. व्यास के मुताबिक स्कूलों में टॉयलेट नहीं होने की वजह बजट की कमी नहीं है। बजट तो अच्छाखासा है।
जरूरत है तो स्कूल प्रबंध समितियों को जागृत करने की ताकि वे इन सुविधाओं को जुटाने की पहल करें। वहीं, बजट अध्ययन केंद्र (बार्क) के एजुकेशन बजट एनालिस्ट महेंद्र सिंह टॉयलेट के लिए स्पेसिफिक बजट की बात कहते हैं। वे बताते हैं, सालाना बढ़ रहे बजट का एक निश्चित अनुपात स्कूलों में टॉयलेट जैसी सुविधाओं के लिए ही तय हो। इसे खर्च करने व काम होने की सही मॉनीटरिंग भी जरूरी है।
14 साल में भी नहीं बने स्कूलों में टॉयलेट
देश में 1999 में टोटल सेनिटेशन कैम्पेन (टीएससी) शुरू किया गया था। इसके तहत 2012-13 का बजट 3500 करोड़ रु. का है। जिसमें स्कूलों में टॉयलेट निर्माण का हिस्सा 15 फीसदी यानी 525 करोड़ रु. है। राजस्थान को भी काफी पैसा इस मद में मिलता है। इसके तहत केंद्र का हिस्सा 70 फीसदी जबकि राज्य का हिस्सा 30 फीसदी है।