पानी बचेगा तो बचेगी संस्कृति
पुस्तकके लेखकों का कहना है कि यहां के लोगों को पानी दूसरे स्रोतों से मिले तो भी इस पुरातन धरोहर की संभाल जरूरी है। शेखावाटी की ओपन ऑर्ट गैलेरी में कुएं, बावड़ियां हवेलियां ही तो विश्व के पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। यह धरोहर ही नहीं बची तो सैलानी क्या देखने आएंगे।
नएलुक की किताब
पुस्तककी सज्जा भी देखने लायक है। दोनों ओर से खुलने वाली इस पुस्तक का पन्ना एक ही है जो अलग-अलग पेजों में फोल्ड किया गया है। कुओं, बावड़ियों जोहड़ों के सुंदर रेखाचित्र संजोए गए हैं। भारत की जल सीमा, राजस्थान का पानी, पानी का स्थानांतरण आदि पर लेखन के साथ ही भित्तिचित्रों अन्य धरोहरों का भी वर्णन पुस्तक में किया गया है।
किताब में प्रकाशित चारमीनार वाले प्राचीन कुएं का स्कैच।
भास्कर न्यूज | झुंझुनूं
पानीके प्रति आज जो हमारा व्यवहार है, उसने इतिहास संस्कृति को समाप्त कर दिया है। पुराने कुएं और बावड़ियां धीरे-धीरे अस्तित्व खोते जा रहे हैं। लेकिन इन्हें संभालकर अब भी पुरानी परंपरा को कायम रखा जा सकता है। यह कहना है पेरिस (फ्रांस) के स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर की टीचर क्रिस्टीन एस्टीव का। उन्होंने अपनी टीम के आइरीन बेलिअर, क्लाउडिया जोफर्ट जर्मी शेवाल के साथ 10 साल शेखावाटी के अवलोकन के बाद जो पुस्तक लिखी है, उसके हिंदी भाग में सुनहरे पल में भी ऐसा लिखा गया है। राजस्थान-शेखावाटी : कुआं, जोहड़ा, बावड़ी नामक इस पुस्तक में तत्कालीन जल व्यवस्था पर सटीक लिखा गया है। पुस्तक में 20 से अधिक कुओं बावड़ियों का सुंदर चित्रण किया गया है। शेखावाटी की इन धरोहरों का वर्णन फ्रेंच, हिंदी अंग्रेजी में किया गया है।
डस्टबिनबनने से रोकें
क्रिस्टीनने बताया कि इस विषय में रुचि के कारण उन्होंने परंपरागत जलस्रोतों का मौके पर अवलोकन किया। जाना कि उस जमाने में भी शेखावाटी के लोगों को पानी के संरक्षण का अनुपम जरिया मालूम था। क्रिस्टीन कहती हैं कि आज भले ही पानी के उपयोग के तरीके बदल गए लेकिन शेखावाटी के कुएं बावडि़यां अनमोल धरोहर हैं और जल संरक्षण का सबसे अच्छा व्यवहार भी। इन कुओं बावड़ियों को डस्टबिन नहीं बनने दें और साफ-सफाई कर उपयोग में लेना शुरू कर दें तो इससे बढ़कर जल देवता का कोई सम्मान नहीं होगा।