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दो धर्मों के बीच सेतु की कोई जगह नहीं, जैन नहीं रहीं साध्वी चंदन प्रभा : आचार्य महाश्रमण

5 वर्ष पहले
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जोधपुर| जैनसाध्वी चंदनप्रभा के जूना अखाड़ा मेंे महामंडलेश्वर पदवी लेने पर तेरापंथ जैन आचार्य महाश्रमण ने कड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि अखबारों में यह खबर पढ़ी जिसमें यह भी लिखा है कि वे जैन धर्म नहीं छोड़ेंगी परंतु महामंडलेश्वर तो सनातन परंपरा की पदवी है। यदि कोई जैन साध्वी सनातन परंपरा को मानती है तो जैन परंपरा उसे कभी स्वीकार नहीं करेगी।

सम्मान लेकर भी रहूंगी जैन ही : चंदनप्रभा

साध्वीचंदनप्रभा का कहना है कि सनातन धर्म में महामंडलेश्वर का सम्मान दे रहे हैं, उसे मैं स्वीकार रही हूं। मैंने जैन धर्म में जन्म लिया है, जो बदल नहीं सकता। महामंडलेश्वर बनने के लिए एक सनातन साधु को गुरू बनाने, गेरुआ वस्त्र पहनने जैसी प्रक्रियाएं भी वे नहीं अपनाएंगी। आचार्य महाश्रमण की नाराजगी पर बोलीं- मैं जल्द उनसे मिलकर अपनी बात रखूंगी।

र|ेश्वर झा . किशनगंज (बिहार). तेरापंथजैन आचार्य महाश्रमण महाश्रमण इन दिनों बिहार प्रवास पर हैं। उन्होंने कहा है कि साध्वी चंदन प्रभा महामंडलेश्वर का पद ग्रहण करें या कुछ और अपनाएं, अब वे हमारे पंथ या संत की साध्वी नहीं हैं। साध्वी चंदनप्रभा द्वारा जैन और सनातन धर्म के बीच सेतु बनने के सवाल पर आचार्य ने कहा कि अच्छा काम करें, हमें कोई आपत्ति नहीं है। धर्म आध्यात्म का काम करे, अच्छी बात है। दो धर्मों के बीच कोई सेतु नहीं होता। वैसे जैन धर्म में रहते हुए चंदन प्रभा महामंडलेश्वर बनी तो सनातन पथ के लोग उन्हें स्वीकार करेंगे या नहीं, यह तो सनातन धर्म के लोग ही बता सकते हैं। दोनों धर्मों में असमानता पर उन्होंने कहा कि जैन धर्म श्रवण परंपरा है और सनातन धर्म ब्राह्मण परंपरा का अंग। जैन धर्म ईश्वरवाद को नहीं मानता, लेकिन सनातन परंपरा ईश्वरवादी है। वेशभूषा का भी अंतर है।

2 फरवरी को प्रकाशित खबर

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