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निगम: बकाया 140 करोड़, स्कूलों को महज 5 करोड़ के बकाया पर कर दिया सीज

5 वर्ष पहले
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जोधपुर. वंचितों, गरीबों व मध्यम वर्ग के परिवारों के बच्चों को शिक्षा मिल सके, इसके लिए जिन लोगों व सामाजिक संस्थाओं ने कई परेशानियां झेली, आटा तक बेचा, मुश्किलों का सामना कर स्कूलें खड़ी कीं। समाज और सेवा भावना से चल रही इन स्कूलों में मामूली फीस ली जा रही है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च नहीं कर पा रहे, शिक्षकों का वेतन तक देना मुश्किल हो रहा है और अब निगम इनसे लाखों रुपए का नगरीय विकास कर मांग रहा है। हजारों रुपए फीस में वसूल रही निजी स्कूलों के मुकाबले बड़ी मुश्किल से टिकी इन स्कूलों में अगर यह टैक्स वसूला तो शिक्षा के इन मंदिरों को बंद तक करने की नौबत आ सकती है।
दस दशक पूर्व भीतरी शहर की उम्मेद सीनियर सैकंडरी स्कूल की भी यही कहनी है। रावणा राजपूत समाज के न्याति पंचों ने समाज में शिक्षा की अलख जगाने के लिए अपने न्याति नोहरे में यह स्कूल खोली थी। तब तत्कालीन महाराजा से किसी बात को लेकर स्कूल प्रबंधकों का विवाद हो गया था। स्कूल तो तब ही बंद हो जाती, लेकिन पंचों ने ऐलान किया कि समाज के हर घर में घटी (आटा चक्की) में पिसाई के दौरान पहला दौर का आटा मटकी में एकत्र करेंगे।
पंच हर रविवार घर-घर यह आटा लेने जाते और उसे बाजार में बेचकर मिले पैसों से स्कूल का संचालन करते थे। कई बरसों तक यह क्रम चला पर स्कूल बंद नहीं होने दी। इस स्कूल से निकले कई छात्रों ने बाद में देश-दुनिया में अपना नाम भी कमाया, लेकिन अब निजी स्कूलों की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ चुके हैं। जैसे-तैसे स्कूल का संचालन कर रहे हैं, लेकिन अब निगम की आेर से भेजे यूडी टैक्स के डिमांड नोटिस को लेकर असमंजस में हैं। अगर यह पैसा जमा करवाते हैं तो स्कूल पर ताला तक लगाना पड़ सकता है।
ऐसी ही कहानी सामाजिक समरसता के प्रतीक माने जाने वाले सामाजिक संस्थाओं द्वारा संचालित अन्य स्कूलों की भी है। विभिन्न समाजों के पदाधिकारियों व स्कूल संचालकों ने एक स्वर में कहा कि महापौर को एक प्रस्ताव लेकर राज्य सरकार को भिजवाना चाहिए, जिसमें ऐसी सामाजिक संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों को विशेष आदेश से कर मुक्त करवाने का आग्रह किया जाए।
शहर के 20 हजार 198 लोगों और संस्थाओं से एक अरब 40 करोड़ 50 लाख से ज्यादा का यूडी टैक्स बकाया चल रहा है।
लेकिन निगम वंचितों, गरीबों व मध्यम वर्ग के परिवारों के बच्चों को सस्ती, सहज व अच्छी शिक्षा सुलभ कराने वाली 100 वर्षों से चल रही शिक्षण संस्थाओं को छूट देने की बजाय डिमांड नोटिस थमाते हुए कर जमा नहीं करवाने पर सीज कर रहा है। शहर में संचालित हो रहे 233 सामाजिक व निजी स्कूलों व कॉलेजों में यूडी टैक्स के सिर्फ 5 करोड़ 23 लाख रुपए ही बकाया चल रहे हैं। अगर यह राशि निगम कोष में जमा भी हो जाए तो भी निगम की कंगाली दूर नहीं हो सकती है।
पहले कॉमर्शियल, अब संस्थानिक दर से गणना: पूर्व महापौर रामेश्वर दाधीच ने बताया कि स्वायत्त शासन विभाग ने 6साल पहले सरकार के फैसले तक शैक्षणिक संस्थाओं से यूडी टैक्स की वाणिज्यिक दर से वसूली स्थगित की थी। यहीं मंशा थी कि सामाजिक समरसत्ता वाली ये शैक्षणिक संस्थाएं लाखों रुपए जमा नहीं करवा पाएंगी आैर दबाव डाला गया तो ये बंद हो जाएगी।
दैनिक भास्कर ने यह मुद्दा उठाकर सामाजिक समरसता वाली शैक्षणिक संस्थाओं का मान बढ़ाया है। कैसी भी विकट परिस्थितियां आई, लेकिन समाज और न्याति पंचों ने इन स्कूलों को बंद नहीं होने दिया। इस मुद्दे को निगम की साधारण सभा में प्रमुखता के साथ उठाऊंगा।
गणपतसिंह चौहान, पार्षद व कार्यकारिणी सदस्य, उम्मेद सीनियर सैकंडरी स्कूल
राजा और सरकारें तो संबल दिया करती थीं : मेहता.
उस दौर से बहुत पहले राजपरिवार और बाद में जितनी भी सरकारें आईं, सभी शिक्षा के क्षेत्र में समर्पण व सेवाभाव से काम करने वाली संस्थाओं की मदद करती थीं। मुझे तो पूर्वजों से पता चला कि रियासतकाल में जैन समाज का नेतृत्व करने वाले मेहता सरदारसिंह की अगुवाई में समाज के लोगों ने सरदार स्कूल शुरू करने के लिए 1896 में 40 हजार रुपए शाला कोष के लिए देने की घोषणा की थी। इससे शहर के बीच स्थित न्याति नोहरे में ही पांच कमरे बनवाए गए थे।
शुरुआती दौर में स्कूल का वार्षिक खर्च 360 रुपए आता था। राजकीय अनुदान नहीं मिलता था, फिर भी बच्चों से कोई शुल्क तक नहीं लिया जाता था। कुछ समय बाद राज्य से 30 रुपए मासिक अनुदान शुरू हुआ, जो 1913 तक बढ़कर 1440 रुपए कर दिया गया। जब वर्ष 1950 में सिंह सभा ने स्कूल की फीस बढ़ाई थी, तो चंदनमल व गोवर्धन हेड़ाऊ के नेतृत्व में छात्रों का अभूतपूर्व आंदोलन हुआ था, जो 14 दिन तक चला।
ऐसी सेवाभावी संस्थाओं से टैक्स वसूली को शर्मनाक ही कहा जा सकता है। कार्रवाई भी ऐसे समय पर की गई है जबकि परीक्षाएं सिर पर हैं। इससे स्कूल संचालकों और शिक्षकों का मनोबल प्रभावित होगा और यह कार्रवाई बच्चों की मानसिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। -जैसा उन्होंने मुकुल सिंघवी को बताया
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