जोधपुर. बचपन में पेट में कीड़े होने के बाद जो ट्रीटमेंट दिया जाता है, इससे वे कीड़े तो मर जाते हैं, लेकिन उस दवाई के पेरासाइट से होने वाले इन्फेक्शन से हमारे जीन्स में बदलाव भी हो गया है। इससे शहरी क्षेत्रों में आर्थराइटिस, एलर्जी, डाइबिटीज टाइप-1 अौर अल्सर जैसी बीमारियां बढ़ गई हैं। साथ ही बचपन में भी ये बीमारियां होने लगी हैं। महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट अॉफ मेडिकल सेवाग्राम, वर्धा (महाराष्ट्र) में प्रोफेसर बायोकेमिस्ट्री विभागाध्यक्ष डॉ. एमवीआर रेड्डी ने शुक्रवार को यहां भास्कर से बातचीत में यह जानकारी दी।
वे एम्स में चल रही 41वीं नेशनल काॅन्फ्रेंस ऑफ एसोसिएशन ऑफ क्लिनिकल बायोकेमिस्ट्स ऑफ इंडिया (एसीबीकॉन) 2014 में लेक्चर देने आए थे। उन्होंने बताया कि ऐसा पहले केवल पश्चिमी देशों में शुरू हुआ था, लेकिन अब भारत सहित कई विकासशील देशों में हो रहा है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें दवा नहीं खाने पर एक बीमारी से नुकसान और दवा खाने पर दूसरी बीमारियों का खतरा हो गया है। हालांकि यूएस में इससे बचने के लिए बाॅम्ब थैरेपी से नॉन पैथाजनिक पेरासाइट मनुष्य को देकर क्लिनिकल टेस्ट किया जा रहा है।
एसीबी कॉन में हुए ये लेक्चर
नेशनलकाॅन्फ्रेंस में शुक्रवार को चार स्थानों पर 20 से अधिक लेक्चर हुुए। आयोजन सचिव डॉ. प्रवीण शर्मा ने बताया कि क्लिनिकल बायोकेमिस्ट्री डायबिटीज में नवीनतम तकनीक, बायोकेमिकल जेनेटिक्स, लैब मेडिसिन, फंक्शनल डिफिक्टीज टाइप 1 2 डायबिटीज जैसे विषय शामिल थे। सह आयोजन सचिव डॉ. जयराम रावतानी ने बताया कि नई तकनीक के इंस्ट्रूमेंट्स की जानकारी भी दी गई।
काॅन्फ्रेंस में भाग लेने आए एसजीपीजीआई लखनऊ में जेनेटिक्स के प्रोफेसर डॉ. बलराज मित्तल ने कहा कि हमारे यहां एक बीमारी के लिए सभी को एक तरह का ट्रीटमेंट दिया जा रहा है, जबकि सभी लोगों को समान दवा और उसकी डोज भी एक सी नहीं चाहिए, लेकिन रिएक्शन होने पर डोज कम कर दी जाती है और असर नहीं करने पर डोज बढ़ा दी जाती है। विश्व में दवाई के रिएक्शन या असर नहीं करने से होने वाली मौतों की संख्या दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के बराबर है।