जोधपुर. जेडीए की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरने की सबसे बड़ी वजह उसकी प्लानिंग विंग है। इस विंग ने पिछले डेढ़ साल में एक भी स्कीम लाॅन्च नहीं की, जबकि विंग में निदेशक सहित 18 अफसर कार्मिक काम करते हैं। इनमें 1 डीटीपी, 3 एटीपी, 3 ड्राफ्टमैन, 3 एलडीसी, 1 ट्रेसर, 1 कंप्यूटर ऑपरेटर, 2 गैंगमैन और 3 अरबन प्लानर (कॉन्ट्रेक्ट पर) कार्यरत हैं।
इनके वेतन, भत्ते सहित प्रतिमाह पूरी विंग का खर्चा करीब पंद्रह लाख रुपए है। इसके बावजूद सर्वे कंसल्टेंसी का काम बाहर की कंपनियों के भरोसे है। हालत यह है कि इस विंग में सिर्फ ठप्पे लगाने, यानी नक्शों को अनुमोदित करने का ही काम हो रहा है। छह माह से तो विंग की बैठक ही नहीं हुई है।
इस कारण पांच सौ से ज्यादा ले-आउट प्लान, बिल्डिंग निर्माण अनुमति की फाइलें अटकी हुई हैं। सबसे महत्वपूर्ण शहर का मास्टर डवलपमेंट प्लान 2031 अटका हुआ है। यह डेढ़ साल से लागू नहीं हो पा रहा है। ऐसे में हर माह करोड़ों की आय भी अटक गई है।
सर्वे कंसल्टेंसी का काम एजेंसियों के भरोसे, विंग की 6 माह में बैठक ही नहीं
छोटे शहरों के निकाय भी जेडीए से आगे रहे
संभाग के छोटे शहरों के स्थानीय निकाय जेडीए से आगे रहे हैं। पिंडवाड़ा में अफॉर्डेबल योजना लाॅन्च की गई। वहीं पाली, जैसलमेर बालोतरा में भी नई योजनाएं लाॅन्च कर निकाय की आर्थिक स्थिति सुधारी।
सर्वे के पेटे अभी भी दो करोड़ के बिल बाकी
डेढ़ साल में प्लानिंग विंग ने ट्रांसपोर्ट नगर, आंगणवा, केरू जैसी बड़ी योजनाओं के सर्वे का काम निजी फर्मों से करवाया। जेडीए की फाइनेंस विंग के अनुसार कंपनियों के अभी भी दो करोड़ के बिल पेंडिंग हैं।
मोगड़ा कलां के बाद कोई नई स्कीम लॉन्च नहीं
जेडीए ने डेढ़ साल पहले वर्ष 2013 में मोगड़ा कलां में कर्मचारियों की कॉलोनी लाॅन्च की थी। इसके बाद अब तक कोई नई स्कीम लाॅन्च नहीं की गई और जेडीए की वित्तीय स्थिति खराब होती चली गई।
डायरेक्टर बोले- मुझे इस बारे में जानकारी नहीं
मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है, इस बारे में जेडीसी से बात करें। -बीडीजाट, डायरेक्टर (प्लानिंग), जेडीए