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सांगरिया आरओबी शुरू हो गया है। भास्कर ने 22 सितंबर को यह जानकारी दी थी।

7 वर्ष पहले
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सात साल में बीआरओ ट्रैफिक का अंदाजा लगा पाया, अन्य जिम्मेदार विभागों ने नक्शा देखा

ऐसी क्या परिस्थितियां थीं कि बिना सुरक्षा जांच के खोल दिया ब्रिज

सरकारीविभागों में तालमेल नहीं होने से कैसे हर साल करोड़ों रुपए बर्बाद हो जाते हैं, इसका ताजा उदाहरण सांगरिया ब्रिज है। इस ब्रिज को बनने में सात साल लगे, लेकिन बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) जैसे अनुशासित महकमे के अफसर भी ब्रिज बनाने से पहले इस पर से गुजरने वाले ट्रैफिक का या तो अंदाजा नहीं लगा पाए या फिर जानबूझ कर अनदेखी की। उधर नेशनल हाइवे अथॉरिटी, पीडब्ल्यूडी जेडीए के अफसर भी सात साल तक बाइपास पर निर्माणाधीन ब्रिज की डिजाइन देखने की फुर्सत ही नहीं जुटा पाए। अगर इन विभागों में आपसी तालमेल होता या इन विभागों के अफसर फुर्सत निकाल कर डिजाइन देख लेते तो शायद यह ब्रिज टू लेन तो नहीं बनता। सरकारी महकमों की इस कमी के कारण ही सांगरिया ओवरब्रिज चौड़ा होने की बजाय सिकुड़ गया, जिससे लोगों की जान पर बन आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीआरओ की जिम्मेदारी थी कि वह टेंडर जारी करते समय रोड यूजर्स की सभी जरूरतों का ध्यान रखता।