जोधपुर. जोधपुर महानगर का रूप ले रहा है, लेकिन कनेक्टिविटी सिटी ट्रांसपोर्ट के मामले में अभी फिसड़्डी ही है। बाड़मेर में रिफाइनरी, जोधपुर में एम्स, आईआईटी, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी सहित अन्य विश्वविद्यालय हैं तो राष्ट्रीय राज्य स्तर के कई संस्थान भी शहर में चुके हैं। ऐसे में शहर की पहली जरूरत लोकल स्तर पर बेहतर कनेक्टिविटी है, लेकिन पिछले सात सालों से पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर अफसर गुमराह ही करते रहे हैं। सात साल पहले तत्कालीन भाजपा सरकार ने आनन-फानन में बीआरटीएस के नाम पर शहर में दस लग्जरी बसों का संचालन कर लोगों को गुमराह किया तो एक साल पहले तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 39 बसें खरीद कर भेजने से पहले एक बार भी गंभीरता से नहीं सोचा कि इनका संचालन कौन करेगा? इतनी बसें एक साथ संचालित करने के लिए चालक सहचालक का स्टाफ कहां से उपलब्ध होगा? बसों के संचालन का खर्च कौनसी एजेंसी उठाएंगी? इसी का परिणाम है कि 39 बसों में से सिर्फ 10 बसें ही सड़कों पर उतर पाई। शेष बसें पिछले एक साल से वर्कशॉप से बाहर ही नहीं निकल पा रही हैं। दस करोड़ खर्च कर 39 बसें खरीद तो ली, लेकिन इन बसों को सड़कों पर उतारने में स्थानीय प्रशासन को ही नहीं, सरकार को भी पसीना रहा है।