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डाउनलोड करेंजोधपुर. नगर निगम में मंगलवार को फर्जी रसीदों के जरिए भूखंड हड़पने की साजिश का पर्दाफाश हुआ। इस मामले में अपने आपको सूरसागर निवासी कुलदीप बताने वाले उस व्यक्ति की तलाश की जा रही है। निगम पुलिस में मामला दर्ज करवा कर इस बात की भी तफ्तीश करवाएगा कि कहीं इसमें किसी गिरोह का हाथ तो नहीं है।
जानकारी के अनुसार अपने आपको सूरसागर निवासी कुलदीप बताने वाला एक शख्स मंगलवार को निगम कार्यालय पहुंचा। वह कमरा नंबर 4 में कनिष्ठ लिपिक दीपक पंडित से मिला और कुछ रसीदें दिखाकर भूखंड नियमन करवाने की बात कही। रसीदें देखकर पंडित को इनके फर्जी होने का अंदेशा हुआ। वे राजस्व अधिकारी व वरिष्ठ लेखाधिकारी के पास पहुंचे। दोनों अधिकारियों ने भी रसीदों को प्रथम दृष्ट्या फर्जी पाया। संदेह गहराने पर वरिष्ठ लेखाधिकारी दिलीप गुप्ता ने रसीदों पर अंकित तारीख के स्टेटमेंट निकलवाए और जांच की। इसके बाद रसीदों के फर्जी होने की बात पुख्ता हो गई।
कनिष्ठ लिपिक ने जब कुलदीप से पूछताछ की तो उसने उन्हें मोबाइल फोन पर कथित तौर पर पूर्व पार्षद गणपत सिंह से बात करवाई। दूसरी ओर से बात कर रहे कथित पूर्व पार्षद ने भी कुलदीप का काम करने की सिफारिश की। इसके बाद उसने बताया कि वह सहवृत्त पार्षद रह चुके शंभुसिंह पंवार का भानजा है। इसके बाद कुलदीप वहां से गायब हो गया। निगम प्रशासन को कुलदीप के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने में दिक्कत आई।
राज्य सरकार ने सोमवार रात को कार्यवाहक सीईओ व शहर आयुक्त ओपी जैन को एपीओ कर दिया था। वहीं सरदारपुरा आयुक्त मंगलराम पूनिया व सूरसागर आयुक्त रामकिशोर माहेश्वरी अवकाश पर थे। ऐसे में लीज शाखा की ओआईसी (ऑफिस इंचार्ज) अनिता पहाडिय़ा ने वरिष्ठ लेखाधिकारी को जांच सौंपी है। साथ ही पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाने को कहा है।
...तो 40 लाख की जमीन का पट्टा बन जाता
कुलदीप ने फर्जी रसीदों में सूरसागर इलाके में अपनी जमीन दर्शाई। उसने संबंधित कॉलोनी या इलाके का खुलासा नहीं किया, लेकिन रसीद के जरिए सूरसागर में 860 गज जमीन का नियमन करने की मांग की। जानकारों के अनुसार संभवतया कुलदीप का कोई भूखंड है ही नहीं। वह नियमन के आधार पर किसी भी सरकारी या गैर सरकारी जमीन पर कब्जा कर लेता। कभी हटाए जाने की नौबत आती तो रसीदें व नियमन के कागज दिखा कर अपना दावा पेश कर देता। वह कुछ ही दिनों में 40 लाख रु के भूखंड का मालिक बन जाता। यह राशि आरक्षित दर के हिसाब से है, जबकि डीएलसी दर से यह एक करोड़ से भी ज्यादा का भूखंड होता।
यूं पकड़ में आया फर्जी रसीद कारनामा
कुलदीप द्वारा पेश की गई रसीद को जब बाबू ने हाथ में पकड़ा तो निगम की रसीद के कागज व उस रसीद के कागज की क्वालिटी में फर्क महसूस हुआ। कुलदीप की बताई रसीद पर कैशियर की बजाय कार्यालय अधीक्षक की मोहर व हस्ताक्षर थे। पैसे जमा करने वाले निगम के संग्रहणकर्ता का नाम भगवतीलाल चौहान लिखा था जो छह माह पूर्व सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि रसीद पर 7 अक्टूबर 2013 की तारीख अंकित थी। रसीद की सीरीज की जांच की गई तो वह भी फर्जी पाई गई। दूसरी रसीद पर तो सीरीज नंबर ही गायब थे।
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