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कंपनी को फायदा पहुंचाने किया गोलमाल, दोनों हाथों से लुटाया सरकार का पैसा!

8 वर्ष पहले
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जोधपुर.जोधपुर विकास प्राधिकरण ने सड़क सुरक्षा सप्ताह के नाम पर ऐसी-ऐसी गलियों में स्पीड ब्रेकर लगा दिए जो रोड मैन्युअल के ही खिलाफ थे। यह सब इसलिए किया ताकि कंपनी ठेकेदार को अधिक से अधिक फायदा मिले। ऐसे में 29 लाख का बजट 90 लाख रुपए तक पहुंचा दिया गया। बाद में ये राहगीरों के मुसीबत साबित हुए तो सभी को हटा दिया गया। ऐसे में पूरे 90 लाख रुपए पर पानी फिर गया।
पार्षदों, संस्थाओं और मोहल्ला समितियों की मांग पर ही पग-पग पर स्पीड ब्रेकर लगाते गए। हालांकि हाईकोर्ट की फटकार के बाद जेडीए के अफसरों ने काम तो रोक दिया था, लेकिन तब तक 90 लाख रुपए बर्बाद हो चुके थे।सीधे तौर पर अफसरों ने फाइबर स्पीड ब्रेकर लगाने के नाम पर दोनों हाथों से सरकारी पैसा लुटाया।
डीबी स्टार की पड़ताल में पता चला कि ब्रेकर लगाने के लिए जेडीए ने एक कंपनी को फरवरी में टेंडर जारी किया था। इसके तहत शहर की विभिन्न सड़कों पर 29 लाख रुपए के फाइबर स्पीड ब्रेकर लगाए जाने थे। कंपनी ने मनमर्जी से जहां चाहा वहां स्पीड ब्रेकर लगा दिए और तीन गुना अधिक बिल पेश कर दिए। गंभीर बात यह है कि अफसरों ने भी बिना कुछ देखे कंपनी को भुगतान करवा दिया। नतीजतन, 90 लाख रुपए के स्पीड ब्रेकर लग गए। बाद में इन सब को हटाना पड़ा। अफसरों की अदूरदर्शिता के कारण लोगों की गाढ़ी कमाई बर्बाद हो गई। डीबी स्टार के पास वास्तविक स्पीड ब्रेकर लगाने से लेकर अतिरिक्त लगाए गए स्पीड ब्रेकर के हिसाब के दस्तावेज हैं।
संस्थान, मोहल्ला समितियों के कहने पर लगाते गए और बिल बढ़ता गया
2 हजार की जगह लगा दिए 6 हजार मीटर
जेडीए ने शहर की सड़कों पर फाइबर स्पीड ब्रेकर लगाने के लिए रूपा कंस्ट्रक्शन कंपनी को ठेका दिया था। कंपनी को प्रति मीटर 1450 रुपए की दर से 2000 मीटर की लंबाई के विभिन्न जगहों पर स्पीड ब्रेकर लगाने थे। कंपनी ने अपने हिसाब से गली-गली में ब्रेकर लगा दिए। ऐसे में ये तीन गुना अधिक यानी 6232 मीटर में लगे।
अफसर चाहते तो बच सकते थे 61 लाख
कंपनी फाइबर के स्पीड ब्रेकर लगा रही थी, उसी दौरान इनको लेकर विरोध होने लगे थे। लेकिन अफसरों ने डिमांड और सहूलियत के नाम पर ज्यादा ब्रेकर लगाने का हवाला देकर कंपनी को फायदा पहुंचाया। अगर स्पीड ब्रेकर की समय पर सही जांच होती और ज्यादा संख्या में नहीं लगते तो इस व्यर्थ व्यय में 70 प्रतिशत की कमी आती।
रबर बंप की जांच भी जरूरी नहीं समझी
ये स्पीड ब्रेकर जहां भी लगे, वहां से निकलने वाले दर्द से कराह उठते। कंपनी के पहले टेंडर में किए गए काम के दौरान अफसर अगर ठीक से रबर बंप की जांच करते तो इसकी हकीकत पता चल सकती थी, लेकिन जेडीए के फाइनल बिल में रबर की जांच के कॉलम में लिखा है कि बंप की जांच पूर्व में संलग्न है, अब इसकी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार से रबर बंप हलके लगे और बाद में हटाने पड़े।
एक्सईएन से लेकर जेडीसी ने लागत बढ़ाई
यह ऐसा मामला था, जिसमें एक्सईएन, एसई, डायरेक्टर इंजीनियर और खुद जेडीए कमिश्नर ने अपनी पॉवर का इस्तेमाल करते हुए वित्तीय मंजूरी प्रदान की। पहली बार एक्सईएन मोहनलाल ने 21 अक्टूबर 2011 को 2 लाख 34 हजार 900 की एक्सेस मंजूरी दी। दूसरी बार 17 फरवरी 2012 को इन्होंने 6 लाख 25 हजार 820 की मंजूरी दी। एक्सईएन को 10 लाख तक की मंजूरी देने का पॉवर है। तीसरी बार अतिरिक्त कार्यभार संभालने वाले एसई केके माथुर ने 5 मार्च 2012 को 10 लाख 18 हजार 755 के ब्रेकर लगवाए। चौथी बार 23 मार्च 2012 को डायरेक्टर इंजीनियर एमएस रावल ने 20 लाख 34 हजार 132 की एक्सेस मंजूरी दी, जो की 26 प्रतिशत से ज्यादा थी। 30 प्रतिशत से ज्यादा का पॉवर जेडीसी को ही होता है और उन्होंने भी 34 लाख 51 हजार की अतिरिक्त मंजूरी 18 अप्रैल 2012 को दी।
अफसरों ने पल्ला झाड़ा ठेकेदार को अब कुछ याद नहीं
'इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता, हाईकोर्ट के आदेश से फाइबर स्पीड ब्रेकर हटाए गए थे। जो राशि बढ़ाई, वह भी मंजूरी लेकर बढ़ाई थी।'
रतन लाहोटी, तत्कालीन आयुक्त, जेडीए
'ठेकेदार को दो हजार मीटर में स्पीड ब्रेकर लगाने थे, लेकिन बाद में डिमांड बढ़ती गई। इस कारण एक्सेस बढ़ा। वित्तीय मंजूरी सक्षम अफसरों ने दी थी।'
रामलाल सियाग, एसई
'मुझे जिस रेट से काम दिया था, उसी के अनुसार किया था। दो साल बाद मुझे ज्यादा कुछ याद नहीं है। ब्रेकर लगाने में कोई गड़बड़ी नहीं थी।'
हंसराज, ठेकेदार, रूपा कंस्ट्रक्शन कंपनी
कंपनी को 2 हजार मीटर फाइबर स्पीड ब्रेकर लगाने थे, लेकिन 6232 मीटर पर खर्च किए 90 लाख रुपए, देखिये आगे की स्लाइड्स...