जोधपुर.नगर निगम से चार हजार पत्रावलियां गायब हैं। इनमें से ज्यादातर उन इलाकों की हैं, जो जेडीए से निगम में ट्रांसफर हुई थीं। इनमें खाली भूखंड की पत्रावलियां भी शामिल हैं। शहर में पत्रावलियां गायब होने के कई किस्से हैं, लेकिन दोषी कर्मचारियों और अफसरों के खिलाफ कभी कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई।
नगरीय विकास विभाग के प्रमुख शासन सचिव जीएस संधु के सामने बुधवार को पत्रावलियां गायब होने का मुद्दा उठा था। आरोप लगा था बाबुओं के घर पर फाइलें पड़ी रहती हैं। इसके जवाब में कर्मचारियों ने कहा, पार्षद अपने घर ले जाते हैं फाइल। ‘भास्कर’ ने इस मामले में जानकारों से बातचीत की तो पता चला कि मूल पत्रावली गायब करवाकर भूमाफिया इसकी डुप्लीकेट इश्यू करवा लेते हैं। इस तरीके से वे लाखों की हेराफेरी तो करते ही है, मूल आवंटी के भूखंड भी हथिया लेते हैं।
अब सीसीटीवी कैमरे से होगी निगरानी : मीणा
नगर निगम के सीईओ रामजीवन मीणा ने कहा कि जब तक कोई ठोस सबूत नहीं मिलता, तब तक किसी पर भी कार्रवाई करना संभव नहीं होता है। जब भी कोई ठोस सबूत मिले हैं तो संबंधित कर्मचारी या अधिकारी पर कार्रवाई भी हुई है। पत्रावली को सुरक्षित रखने के लिए ही पहले रिकॉर्ड शाखा में व्यवस्था की, अब सीसीटीवी कैमरे व अन्य नई व्यवस्था कर रहे हैं।
फाइलें घर ले जाना महापौर की नाकामी: बिजाणी
नगर निगम में दो दिन से गर्माए इस प्रकरण के बीच शुक्रवार को प्रतिपक्ष के नेता गणोश बिजाणी ने फाइलें घर ले जाने को महापौर रामेश्वर दाधीच की नाकामी बताया है। भाजपा पार्षद खुमसिंह गहलोत, संजय दहिया, रामदेवी लोहिया, गीता भाटी, सुनीता झामनानी, सुशीला वर्गी, जुबेदा बानो, रशी दा बनो, नैन कंवर, अमिता त्रिवेदी, निर्मला शर्मा ने भी एक संयुक्त बयान जारी किया है। इसमें बताया कि तीन साल से आग्रह बावजूद वे निगम में नियमित रूप से नहीं बैठ रहे हैं।
निगम की फाइलें: वह सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं
क्या होती है पत्रावली ?
शहर की किसी भी कॉलोनी, मोहल्ले या बस्ती में रहने वाला व्यक्ति नियमन करवाने, लीज डीड जारी करने, नाम हस्तांतरण करवाने, लैंड कन्वर्जन व अन्य कार्य के लिए पत्रावली लगाता है। इसमें आवेदन के साथ सभी आवश्यक चैनल डॉक्यूमेंट होते हैं।
कितनी महत्वपूर्ण ?
पत्रावली में चैनल डॉक्यूमेंट होने के साथ संबंधित अधिकारियों की तथ्यात्मक टिप्पणी होती है। पत्रावली स्वीकृत व निरस्त होने की जानकारी भी होती है। इसके साथ पत्रावली पर पेज नंबर अंकित होते हैं। ऐसे में गड़बड़ी होने पर क्रम बिगड़ने से हेराफेरी आसानी से पकड़ी जा सकती है।
कैसे चलती है पत्रावली
लीज डीड के लिए सबसे पहले एकल खिड़की पर आवेदन जमा करवाना पड़ता है। पत्रावली दर्ज होकर संबंधित शाखा का बाबू मांग पत्र भरता है और रिकॉर्ड शाखा से पत्रावली निकालने की मांग करता है। पत्रावली में बाबू अपनी टिप्पणी कर लीज प्रभारी (ओआईसी) के पास भिजवा देता है। वहां से पत्रावली संबंधित जेईएन व विधि अधिकारी के पास जाती है। चैनल डॉक्यूमेंट चैक करने के बाद संबंधित जेईएन मौका रिपोर्ट देता है। पत्रावली वापस पुटअप होते ही ओआईसी के पास लौट आती है। ओआईसी पत्रावली मार्क कर सीएमसी (संबंधित आयुक्त) के पास भेजता है। अंत में महापौर के हस्ताक्षर से लीज डीड जारी हो जाती है।
किसके पास सुरक्षित रहती है?
पत्रावली संबंधित शाखा के बाबू के पास सुरक्षित रहती है। अगर पत्रावली का निस्तारण हो जाता है तो समस्त पत्रावली रिकॉर्ड रूम में जमा हो जाती है। इसे दुबारा निकालने के लिए संबंधित शाखा का बाबू या संबंधित आयुक्त ही अधिकृत व जिम्मेदार होता है। गायब होने पर संबंधित शाखा के लिपिक जिम्मेदार होते हैं।
कितने समय तक रहना जरूरी?
लीज डीड, नाम हस्तांतरण, धारा 91, कच्ची बस्ती, 90बी, लैंड कन्वर्जन सहित अन्य पत्रावलियां संबंधित विभागों में या रिकॉर्ड रूम में हमेशा के लिए सुरक्षित रखी जाती हैं ताकि किसी भी समय कोई विवाद होने पर उसका आसानी से निपटारा किया जा सके, लेकिन अतिक्रमण व डीओ की पत्रावली कुछ सालों के लिए ही सुरक्षित रखी जाती है।
गायब हो जाए तो कौन जिम्मेदार?
लीज डीड शाखा, नियमन शाखा, लैंड कन्वर्जन, कच्ची बस्ती नियमन शाखा, भवन निर्माण शाखा में जमा पत्रावली गायब होने पर हमेशा बाबू पर ही गाज गिरती है। पत्रावली भले ही अफसरों के कक्ष, जनप्रतिनिधियों या अन्य किसी से गुम हुई हो।
और गायब हो गई तो क्या होगा ?
दो साल पहले तक पत्रावली गुम होने पर संबंधित जोन आयुक्त निगम की सभी शाखाओं में खोज पत्र जारी करते हैं। प्रत्येक शाखा व उसके बाबूओं से पूछताछ होती है। पहले आयुक्त डुप्लीकेट पत्रावली जारी करने के आदेश जारी कर देते थे, लेकिन बाद में निगम बोर्ड की बैठक में हुए फैसले के मुताबिक खोज पत्र निकालने के बावजूद पत्रावली नहीं मिलती है तो संबंधित थाने में मुकदमा दर्ज करवाया जाता है। इसके बाद ही डुप्लीकेट पत्रावली इश्यू की जाती है।
पत्रवालियों की छोटी सी कहानी
खतरा: दमकलों को खड़ा करना पड़ा
पांच साल पूर्व जब जेडीए की विकसित कॉलोनियों की पत्रावलियां निगम में शिफ्ट की गई तो तत्कालीन सीईओ कृष्ण कुणाल ने एक सप्ताह तक निगम परिसर में दो दमकलें खड़ी रखीं। उन्हें इस बात की भनक लगी थी कि कुछ विवादित पत्रावलियों को गायब करने के लिए भूमाफिया आग भी लगा सकते हैं।
विडंबना: सिर्फ हस्ताक्षर ने अटकाई
प्रतापनगर शॉपिंग सेंटर की दुकान संख्या 8 की पत्रावली निगम से गायब हो गई। गायब होने तक लीज डीड की पत्रावली पर सिर्फ अफसरों के हस्ताक्षर ही होने शेष थे। मालिक के पास कोई डुप्लीकेट दस्तावेज नहीं होने से यह पत्रावली दुबारा बन ही नहीं पाई।
कार्रवाई: जब घर से ही मिल गई फाइलें
पांच माह पूर्व नगर निगम के ड्राफ्ट्समैन सुनील गुप्ता के घर से नियमन की तीन पत्रावलियां जब्त की गई थी। उसने पत्रावलियां घर पर ले जाकर महापौर, सीईओ सहित अन्य अफसरों के जाली हस्ताक्षर से फर्जी लीज-डीड के आधार पर रजिस्ट्री भी करवा ली थी। सीईओ रामजीवन मीणा ने फर्जी पट्टे की शिकायत पर उसके घर पर छापा मारकर तीन पट्टे बरामद किए थे। इस कार्रवाई की भनक लगते ही ड्राफ्ट्समैन ने सबूत मिटाने के लिए तीनों पट्टों पर महापौर, सीईओ व आयुक्त सहित अन्य अफसरों के जाली हस्ताक्षर पर व्हाटनर लगा दिया, लेकिन रजिस्ट्री के लिए दिए गए दस्तावेज में उसकी करतूत पकड़ी गई। यह ड्राफ्ट्मैन तब से ही निलंबित है।