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आतंकियों ने जोधपुर को बना रखा था स्लीपर सेल, टारगेट पर था ताजमहल और लाल किला

7 वर्ष पहले
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(आईएम का आतंकी अशरफ जून 2011 से मार्च 2013 तक हीरा गोल्ड में मैनेजर था। तब उसने इस ऑफिस को अपना अड्डा बना कर रखा था। चार्जशीट में हीरा गोल्ड के ऑफिस में आतंकी गतिविधियों का उल्लेख है।)
जोधपुर. राजस्थान एटीएस ने गुरुवार को आईएम के दस आतंकियों के खिलाफ चार्जशीट पेश की। चार्जशीट में सामने आया कि आतंकी संगठन ने यहां स्लीपर सेल बना रखी थी। इनके निशाने पर शहर के पर्यटक से लेकर आगरा का ताज महल व दिल्ली का लाल किला भी था। दस आतंकियों में से एक जोधपुर का अशरफ निदा-ए- हक पुस्तिका निकालता था, मारूफ उसे नियमित पढ़ता था। इसके जरिए अशरफ और मारूफ का संपर्क हुआ। नवंबर 12 में अशरफ, बरकत और साबिर ने जयपुर में मारूफ से मिलकर उसे जोधपुर बुलाया। जोधपुर के मंडोर गार्डन में मीटिंग हुई जिसमें मशरफ इकबाल, जहीर व जावेद भी शामिल हुए। इसी गार्डन में जोधपुर के युवकों को शपथ दिलाई गई।

जनवरी 13 में भी जोधपुर से ये लोग जयपुर मीटिंग में शामिल हुए। यहीं से मारूफ व यासीन भटकल की पत्नी जाहिदा के लिए सिम, मोबाइल, डाटा कार्ड व एक लाख रुपए भिजवाए गए। फिर बम बनाने का साजो-सामान भी खरीदा गया। जब मोनू ने जोधपुर में शरण ली तब उसने इन लोगों को बम बनाने की ट्रेनिंग भी दी।
अमार आलिमियत की डिग्री लेकर आईएम के हक में फतवे करता : मारूफ ने बिहार-झारखंड के अमार का परिचय मोहम्मद अता को दिया। अमार का रिश्तेदार मोबाइल कंपनी में काम करता था। अमार की चाची आईएम के आतंकी मंजर इमाम की बहन है। मंजर इमाम गुजरात बम विस्फोट में शामिल था और झारखंड में फरारी काट रहा था। अमार को सऊदी अरब की मदीना यूनिवर्सिटी से आलिमियत की डिग्री लेने को कहा था ताकि वह बाद में आईएम के कार्यों को धार्मिक रूप से सही बता कर भारत में फतवे जारी कर सके। अमार को भी जयपुर में आईएम का सदस्य बनाया गया।
चार्जशीट पेश करने वाली एटीएस टीम
छह माह से इस केस की जांच कर रहे एएसपी प्रभाकर के नेतृत्व में जयपुर-जोधपुर की एटीएस टीम ने यह चार्जशीट पेश की। उन्होंने सभी दस आतंकियों को भी कोर्ट में पेश किया। टीम में जोधपुर एटीएस के एएसपी राकेश पुरी, जयपुर के इंस्पेक्टर चित्रगुप्त, एसआई महावीरसिंह यादव, जोधपुर के इंस्पेक्टर किशनसिंह व एसआई सोमकरण शामिल थे।
जोधपुर में आईएम की स्लीपर सेल के लिए शहर व कस्बों में ऐसे लोगाें को तलाशा जो उनके काम में सहयोग कर सकें। स्थानीय स्तर पर सेल क्रिएट कर एक स्थानीय आका को कमान सौंपी गई। स्लीपर सेल के सदस्यों को यही बताया गया कि वे सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। सेल के रूप में काम करने वाले सदस्यों को एक-दूसरे की जानकारी नहीं थी। हैडक्वार्टर से आदेश मिलने के बाद लोकल हैड समयबद्ध तरीके से सेल के लोगों को अलग-अलग काम की जिम्मेदारी देता था। इनमें साथी के रहने के लिए व मीटिंग की जगह तय करना, वाहन, छोटे-मोटे हथियार व अन्य सामग्री उपलब्ध करवाना आदि कार्य शामिल थे।
सेल शुरू : भटकल को यकीन दिलाकर की भर्तियां
एक तरफ मारूफ जोधपुर के युवकों को स्लीपर सेल बनाने में जुटा था, जबकि पाकिस्तान में बैठे रियाज को उन पर भरोसा नहीं था। दिसंबर 2012 में जब मारूफ ने रियाज को जोधपुर मॉड्यूल के गठन की जानकारी दी और साकिब को नायब के रूप में जोड़ने की बात कही तब रियाज ने कहा कि वह नए लोगों पर जल्दी यकीन कैसे कर सकता है। मारूफ ने बताया कि अशरफ ने ही छह अन्य युवकों को जोड़ा है, वे लोग रियाज भटकल के पुराने साथियों अब्दुल सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर व साजिद मंसूरी जैसे आतंकियों को शरण दे चुके हैं।
अड्‌डा बना : त्रिपोलिया के ऑफिस में होने लगीं मीटिंगें
अशरफ का त्रिपोलिया बाजार स्थित हीरा गोल्ड ऑफिस आतंकियों का अड्डा बन चुका था। यहीं मारूफ, अमार व वकार अजहर आते और रुकते थे और जोधपुर के युवकों से भी यहीं मंत्रणा होती थी। दिसंबर 2012 में यहीं पर आतंकियों ने जोधपुर आने वाले विदेशी व अमेरिकी पर्यटकों पर चाकू से हमले की योजना बनाई और अशरफ को जोधपुर का अमीर नियुक्त किया था। इसके लिए दो टीमें बनाई, एक टीम में साकिब व इकबाल और दूसरी टीम में जावेद व बरकत थे। इन लोगों ने घंटाघर, नई सड़क व मेहरानगढ़ में पर्यटकों को चाकू मारने का प्रयास भी किया।
जिम्मेदारियां दी : हथियार जुटाए, पैसा जमा किया
मशरफ इकबाल को संगठन के लिए पैसा एकत्र करने का जिम्मा मिला।
साकिब जो कंप्यूटर का जानकार था, उसे रियाज से संपर्क रखने का काम मिला।
बरकत को आतंकी गतिविधियों के लिए खुले हाथ से पैसा देने का काम दिया गया।
अशरफ को जबलपुर से छोटे हथियारों का इंतजाम करने का काम दिया गया।
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