जनभावनाओं की वाहक बने हिंदी
कोटा| वर्धमानमहावीर खुला विवि के गांधी भवन में सोमवार को एक दिवसीय कार्यशाला और काव्यगोष्ठी आयोजित की गई। हिंदी का बदलता मुहावरा-भाषा और संदर्भ विषयक इस कार्यशाला की अध्यक्षता राजस्थान विवि के प्रो. अनिल जैन ने की।
कार्यशाला में नेशनल पीजी काॅलेज खटीमा उत्तराखंड के डाॅ. सिद्धेश्वर सिंह, काशी हिंदू विवि वाराणसी के प्रो. आशीष त्रिपाठी और टीवी पत्रकार बिचित्रमणि ने कहा कि हमें भाषा के नाम पर केवल हिंदी ही नहीं बल्कि इससे जुड़ी बहुभाषाओं की भी चिंता करनी होगी। वक्ताओं ने कहा कि रूप, लज्जा, सौंदर्य, भाव, न्याय, असंतोष, क्रोध, रूचि, परिष्कार, तिरस्कार जैसी सभी भावनाओं की मुखर अभिव्यक्ति ही भाषा को परिपुष्ट कर जनभाषा बनाती है। एक भाषा परिवार की तरह हिंदी को भी दूसरी भाषाओं के साथ साझा होने से परहेज नहीं करना चाहिए। वक्ताओं ने हिंदी के नाम पर पनप रहे भाषाई पर्यटन तथा अन्य भाषाओं को लेकर पूर्वाग्रही मानसिकता को बड़ा खतरा बताया। कार्यशाला के दौरान उपस्थित संभागियों ने सवाल करके अपनी जिज्ञासाएं शांत की।
इसी कड़ी में ओम नागर के संयोजन में एक काव्यगोष्ठी भी आयोजित की गई। इसमें शरद तैलंग, डाॅ सिद्धेश्वर सिंह, प्रो. आशीष त्रिपाठी, ओम नागर, डाॅ अनिल कुमार जैन, महेंद्र नेह और अंबिकादत्त ने एक से बढ़़कर एक रचनाएं सुनाईं। इस अवसर पर प्रो. पीके शर्मा ने कहा कि समर्थ भाषा निर्माण के लिए ऐसे आयोजनों की काफी अहमियत है। काव्यगोष्ठी के अंत में विवि में आयोजित विविध हिंदी विषयक प्रतियोगिताओं के विजेताओं का सम्मान किया गया। मंच संचालन डाॅ. पतंजलि मिश्रा ने किया।
वर्धमान महावीर खुला विवि में कार्यशाला और काव्यगोष्ठी में शामिल अितथि।