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रोजगार से जोड़ा जाए तभी मजबूत होगी हिन्दी की जड़ें
1926 से हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर रही है भारतेंदु समिति
{बशीर अहमद मयूख, वरिष्ठ साहित्यकार
हिन्दीने पर्याप्त प्रगति की है इसलिए मैं निराश नहीं हूं। लेकिन, हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत कुछ होना शेष है। उसे सरकारी कामकाज और न्यायालयों की भाषा बनाना पड़ेगा। मैं हिन्दी दिवस की जगह इसे राष्ट्र भाषा दिवस के रूप में मनाना ज्यादा बेहतर समझता हूं। इसे क्षेत्रीय भाषाओं की बड़ी बहन के रूप में विकसित किया जाए ताकि उनका भी विकास हो। प्रेमचंद और शरत के साहित्य से बहुत प्रभावित रहा हूं आजकल वैज्ञानिक निबंधों को लेकर काम कर रहा हूं। एक निबंध संग्रह तैयार है। प्रकाशन के लिए प्रयासरत हूं।
{अंबिकादत्त, वरिष्ठ कवि
हिन्दीका परिदृश्य काफी उज्ज्वल है। विश्व में चौथे नंबर की भाषा है। बहुत बड़ा वर्ग इसे बोलता और समझता है। लेकिन, हमारी उपनिवेशिक मानसिकता और दोरंगेपन के कारण हिन्दी को भी उतना खतरा है जितना हमारी संस्कृति को। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में हिन्दी का प्रयोग बढ़ना चाहिए। प्रेमचंद का गोदान, भगवतीचरण वर्मा का टेढ़े मेढ़े रास्ते, नरेश मेहता का यह पथ बंधु था, अज्ञेय का उपन्यास शेखर एक जीवनी महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। जिनसे मैं काफी प्रभावित हूं। आजकल संस्मरण और गद्य व्यंग्य लिख रहा हूं। साथ में कविता लेखन सतत जारी रहता है
{डाॅ.क्षमा चतुर्वेदी, वरिष्ठ कथाकार-लेखिका
हिन्दीकी स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं है। एक दिन हिन्दी दिवस और 364 दिन अंग्रेजी दिवस मनाते हैं। ये ठीक नहीं है। हालांकि दक्षिण में भी हिन्दी को लेकर रूझान और सीखने की ललक बढ़ी है। हमें अपनी भाषा से प्यार करना होगा और उसे व्यवहार में लाना होगा। प्रेमचंद और शरत साहित्य का काफी प्रभाव रहा है। शरत का देवदास और चरित्रहीन, शिवानी की कहानियां और अमृता प्रीतम का रसीदी टिकट मेरी प्रिय कृतियां रहीं हैं। इन दिनों एक उपन्यास और सामाजिक विषयों को लेकर कुछ कहानियों पर काम कर रही हूं।
{शरद उपाध्याय, व्यंग्यकार कथाकार
हिन्दीको लेकर बहुत आश्वस्त नहीं हूं। कैरियर के लिए लोग अंग्रेजी की ओर भाग रहे हैं। नई पीढ़ी दिग्भ्रमित है, उसे विदेशी संस्कृति का नशा चढ़ा हुआ है। अभिभावकों की मजबूरी है कि उन्हें रोजगार और संतानों का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए अंग्रेजी की शरण में जाना पड़ रहा है। हमें हिन्दी को रोजगारपरक बनाना होग