- Hindi News
- टाइगर लाने हैं, तो विभाग चंबल कालीसिंध कॉरिडोर जीवंत करे
टाइगर लाने हैं, तो विभाग चंबल कालीसिंध कॉरिडोर जीवंत करे
मुकंदराहिल्स टाइगर रिजर्व में टाइगर लाने हैं तो वन विभाग को चंबल-कालीसिंध नदी कॉरिडोर जीवंत करना होगा। यह सवाल मन में इसलिए उठा है क्योंकि रणथंभौर राष्ट्रीय बाघ अभयारण्य से 15 जनवरी 2010 को टी-35 को बाघिन यहां आई। तब से इटावा-सुल्तानपुर वन क्षेत्र रह रही है। यह क्षेत्र कॉरिडोर का पार्ट है।
पांच साल ऊपर का समय इसने यहां गुजार दिया पर मुकंदरा में प्रवेश नहीं किया। वह जहां विचरण कर रहे वहां से मुकंदरा का गागरोन क्षेत्र 60 किलोमीटर दूर है। टी-35 के रिजर्व टाइगर की और नहीं बढ़ने का कारण एक्सपर्ट से जाना तो उनका कहना है कॉरिडोर को जीवित करना जरूरी है। अगर यह होता है तो रणथंभौर से निकलने वाले बाघ-बाघिन स्वतः आएंगे। लेकिन दोनों टाइगर रिजर्व के बीच के चंबल-कालीसिंध नदी मार्ग व्यवस्थित होने से टी-35 आगे नहीं बढ़ रही है। इतने समय में उसने पलायथा का कोटा-बिना रेलमार्ग का ट्रैक पार नहीं किया। एक्सपर्ट वीके सालवान ने इसके लिए वन विभाग को दोष दिया। चूंकि भारतीय वन्यजीव (सुरक्षा अधिनियम 1972) की धारा-36-ए में दिया हुआ है कि दोनों टाइगर रिजर्व के बीच के गलीयारें को वन्यजीवों के आने-जाने के लिए संरक्षित बनाना जरूरी है। परंतु वन विभाग की ओर से अभी तक चंबल-कालीसिंध नदी कॉरिडोर को कंजर्वेशन रिजर्व बनाने का प्रयास नहीं किया। जबकि टी-35 बाघिन मुकंदरा के दरवाजे पर आकर पांच साल से खड़ी है।